Tuesday, October 6, 2026

मुंबई का खूबसूरत मानसूनी हिल स्टेशन (कृष्णागिरी) Monsoon Hill Station of Mumbai

       मुंबई का खूबसूरत मानसूनी हिल स्टेशन (कृष्णागिरी) Monsoon Hill Station of Mumbai 

यूं तो मुंबई के आस पास बहुत सारे हिल स्टेशन है और मुंबई में कुछ खूबसूरत किले भी हैं, अपनी बहन और भांजे के पास रात्रि में राखी बँधवाकर और विश्राम कर, सुबह मैँ नाश्ता वगैरह करके कैब बुक करके निकल पड़ा कृष्णागिरी की यात्रा के लिए, पवई से निकलकर थोड़ी देर में कैब आरे फॉरेस्ट में चल पड़ी दोनों तरफ हरा भरा जंगल जिन्हें देखकर आप कह नहीं सकते कि क्या आप मुंबई में सफर कर रहे है, हाँ पतली सड़क पर वाहनों की भीड़ , काले पीले ऑटो को देखकर आप ज्यादा देर भ्रम में भी नहीं रह सकते,लेकिन दोनों तरफ की हरियाली अद्भुत हैं। टैक्सी ड्राइवर ने बताया कि ,पीछे, इस आरे फॉरेस्ट को बचाने के लिए वहाँ के निवासियों ने काफी प्रोटेस्ट किया था। ईश्वर करे मुंबईवासियों की ऑक्सीजन की यह नली इनके शरीर से ना हटाई जायें। (फोटो एवं विडिओ नीचे देखे)

                                              (शुरुआत आरे फॉरेस्ट की हरियाली से - अगस्त 2026)                                    फॉरेस्ट पार करते ही दोनों तरफ गगनचुंबी इमारतें, तेज फर्राटा भरती हुई गाड़ियाँ, एक तरफ दौड़ती हुई मेट्रो का पुल, गाड़ी ने यू टर्न लेकर मुझे बोरीवली में स्थित संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के बाहर मुझे छोड़ दिया , जहाँ दरवाजे के ठीक सामने, सड़क के दूसरी तरफ मेट्रो का स्टॉप भी है। मैंने प्रवेश का टिकट रुपये 113 का लिया और अंदर प्रवेश करके सबसे पहले कृष्णागिरी  यानि कन्हेरी गुफाओं का ई बग्गी का 150 रुपये का टिकट लिया (फोटो नीचे देखे) क्योंकि गुफा लगभग 7 किलोमीटर दूर है। यहाँ से बसे भी चलती है जिसका किराया 100 रुपये प्रति सवारी है और चाहे  तो आप पैदल सफर भी कर सकते है। जैसे ही सफर शुरू हुआ हरियाली बरसात के बाद भीगे हुये चमकीले हरे वन क्षेत्र, बीच बीच में पानी के श्रोत, काले घने भारी पानी भर के चलते हुये मेघ, बग्गी में लगती हुई शां शां हवाएं, भीगा भागा दिलकश सफर।  

ई बग्गी गुफाओं से लगभग 1 किलोमीटर पहले ही उतार देती है उसके बाद का सफर पैदल जंगल के बीच बनी हुई पक्की सड़क पर, थोड़ा घुमावदार थोड़ा चढ़ावदार, बंदरों, लंगूरों, सुरीले पक्षियों के बीच, ट्रैकिंग का अच्छा खासा जंगली अनुभव (फोटो नीचे देखें) दूसरे रहगुजरों के साथ और यहीं से आपको एक हिल स्टेशन की शुरुआत महसूस होगी। 

                                    घुमावदार दिलकश हल्की चढ़ाई का सफर (अगस्त 2026) 

                                                   इस पहाड़ी सफर की ट्रैकिंग का विडिओ   

सीढ़ियाँ चढ़कर (फोटो नीचे देखे) टिकट खिड़की है और उसके पश्चात विस्व प्रसिद्ध कान्हेरी गुफ़ाएं – मुंबई का छुपा हुआ खजाना या लुप्त होती हुई धरोहर या प्राण वायु। 

आपके दाहिनी तरफ कृष्णागिरी की चट्टानों पर उकेरित गुफ़ाएं और बाईं तरफ एक हरियाला अद्भुत नजारा जो किसी भी हिल स्टेशन को टक्कर कर देने के लिए सक्षम है। कहते हैं कि ज्वालामुखी के काले लावे से बनी चट्टानों को काटकर निर्मित होने के कारण इस पहाड़ी का नाम कृष्णागिरी पड़ा।


  मानसूनी हिल स्टेशन के नजारे का विडिओ 

इस भागती दौड़ती मुंबई के लिये प्रकृति से रूबरू होने का, अपने अतीत को ढूँढने का या अपने आप को ढूँढने के लिए महात्मा बुद्ध की व्याखानों का, उपदेश का, संदेश का , बहुत बड़ा मूक श्रोत - कान्हेरी की गुफ़ाएं। सदियों पुरानी सभ्यता, और उनके तौर तरीकों को उन निगाहों से देखना, समझना और महसूस करना बहुत अद्भुत है। प्रकृति के बीच पत्थरों को तराश के बनाया हुआ विश्वविद्यालय, एक सभ्यता, उनकी मूक और अंकित भाषा, उनके दर्शाये गये हाव भाव, कुछ कहते हुये और कुछ मौन रह कर भी आपको सोचने के लिए मजबूर करते हुये।

ऊपर पहुँचने पर पहली गुफा के बाहर गार्ड ने बताया कि लगभग 110 गुफ़ाएं हैं और हर गुफा के बाहर एक पानी का कुंड है जो भिक्षुओं की पानी की आवश्यकता के लिए पर्याप्त होता था । इन गुफाओं का निर्माण प्रथम शताब्दी ईस्वी से ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य हुआ था। गुफ़ाएं भगवान बुध के हीनयान और महायान दोनो मतों का उल्लेख करती है। हीनयान यानि जहां बुद्ध प्रतीकात्मक रूप में है जैसे स्तूप, बोधिवृक्ष, पदचिन्ह आदि। परन्तु बाद के काल की महायान गुफाओं में बुद्ध को प्रतिमाओं के रूप में भिन्न भिन्न मुद्राओं में दिखाया गया है।

गुफा संख्या 1 एवं 2 और बुध स्तूप (फोटो नीचे देखे) 


गुफा संख्या 3  चैत्य हाल (फोटो नीचे देखे)

                           कहा जाता है दान दाताओं की मूर्तियाँ (ऊपर) 

अद्भुत है इसके प्रवेश पर के बाद दोनों तरफ द्वारपाल है और फिर दोनों तरफ बुद्ध की विशाल गढ़ी हुई प्रतिमाएं जिनमे प्रतिमाओं के हाथ खुले और नीचे की ओर है शायद इशारा है कि जिंदगी एक खुली किताब है और मनुष्य को जमीनी हकीकत से जुड़े रहना चाहिए क्योंकि जीवन क्षणभंगुर है और अंतोतगत्वा यही मिट्टी हमारी परिणति है। इसके हाल में मैंने भी गार्ड के सिखाने और बताने पर ॐ का उच्चारण किया तो ध्वनि गुंजायमान थी, अद्भुत, लगता है यह स्थान किसी साधना, किसी आस्था से सिंचित है। लगता है कि प्राचीन काल में भी समाज का एक हिस्सा जो आध्यात्म, मानसिक शांति, ध्यान, एकाग्रता से जुड़ा होता था और वो लोग इस ज्ञान को आगे फैलाते थे मतलब भारत का समाज हर युग में शांति और सरलता को महत्व देता था । 

तमाम गुफाओं के लिए छोटी छोटी सीढ़ियों से बनाये गये उतार चढ़ाव वाले रास्ते और मध्य में बहता हुआ जल श्रोत, दूर तक फैला हुआ सघन, निस्तब्ध हरा भरा वन क्षेत्र, झरनों की कल कल, शिक्षा और दीक्षा एवं आश्रय तीनों के लिए माकूल स्थल।


गुफा संख्या 67

थोड़ी सी चढ़ाई थी और बारिश की वजह से रास्ते में हल्की सी फिसलन, गार्ड ने दूर से बताया की आराम से पकड़कर चढ़ जाइए, उधर से भी आप नीचे आ पाएंगे , देखा तो सामने गुफा नंबर 67 आ गई, बहुत सुंदर बुद्ध के चित्र अलग अलग मुद्राओं , अलग अलग दशाओं में, जीवन के विभिन्न रूपों को दर्शाते हुये :- 



चारों तरफ गुफाओं का एक अंतहीन सिलसिला, ऊपर नीचे, दायें बाएं, एक पूरी संस्कृति, एक पूरा समाज, एक समय चलता फिरता ,चहल पहल से भरा हुआ, भिक्षुकों से भरा हुआ, शिक्षकों से भरा हुआ, रहने के लिए सारी व्यवस्थाओं से भरा हुआ, आज एक बिल्कुल निस्तब्ध पहाड़ी, शायद उन इशारों  उन संदेशों को पढ़ने समझने में एक पूरा जमाना निकल जाये। हमारे पूर्वजों की एक अनमोल धरोहर, अमूल्य विरासत, अथक एवं अपार मेहनत या तपस्या जो उन्होनें झुलसती धूप, गरजती बरसातों में की थी इनको गढ़ने के लिए, जल संचयन की कारगर व्यवस्था बनाने के लिए, प्रकाश की समुचित व्यवस्था करने के लिए, एक रूप देने के लिए, अपनी मूक भाषा बोलते हुये आज भी खड़ी हैं उसी धूप और बरसातों से बेपरवाह, बताते हैं कि लकड़ी की कई नक्काशीयां, काफी सामान खराब हो चुका हैं। ये गुफ़ाएं जीते जागते एहसास का एक विलक्षण उदाहरण हैं जिसकों सँजोकर रखना अब हमारी जिम्मेदारी हैं। 

मुझे यह मुंबई के भीतर भीड़ भाड़ से दूर एक बेहद शांत, बात करने वाला, मन को सुकून देने वाला और मनोरम मानसूनी हिल स्टेशन लगता है हालांकि मुंबई से बाहर और आसपास बेहद खूबसूरत मूक पहाड़ियाँ और हिल स्टेशन हैं । 


           संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान, बोरिवली के जंगल का विहंगम दृश्य और सुदूर मुंबई की इमारतें 
इस सुहाने और मदमस्त सफर और एक संस्कृति, धर्म और विरासत को मन में समाए हुये नीचे उतर आया जहाँ खाने पीने, शिकंजी, स्नैक्स, मेगी आदि की सुविधाएं हैं। वहाँ से पुनः लगभग 1 किलोमीटर का हरियाला ट्रैक, कहीं कहीं बंदरों/ लंगूरों के साथ, सुंदर और दुर्लभ पक्षियों की गूंज के साथ, पार करते हुये मैं उस जगह आ गया जहाँ मुझे ई बग्गी ने छोड़ा था । लेकिन अभी वहाँ पर कोई ई बग्गी नही थी, हाँ एक बस जा रही थी, मैंने ड्राइवर को दूर से इशारा किया तो उसने साइड मिरर में देखकर बस रोक ली। लगभग 6 किलोमीटर का सुहाना सफर कराते हुये बस ने मुझे टिकट काउन्टर के पास छोड़ दिया। मैंने टिकट काउन्टर पर लॉयन सफारी का टिकट मांगा तो उन्होंने बताया कि टिकट दोपहर 2 बजे मिलेगा और अभी 1.15 हो रहा था । 

ऐसे में मैंने भी लंच करना उचित समझा और पास में बनी टेबल कुर्सी पर बैठकर दीदी के यहाँ बनी बेसन के गट्टे की सब्जी, बारीक बारीक हरे केर की कूटकर बनाई हुई दुर्लभ राजस्थानी सब्जी ,चपाती के साथ खाई, मजा आ गया । अभी कुछ स्कूल के बच्चों के ट्रिप आ गए थे और छह में से तीन बसें संचालन के लिए ड्राइवर की छुट्टियों की वजह से बंद थी । इसलिए , हमारी बस लगभग तीन बजे चली और वो पहाड़ी क्षेत्र के बाईं ओर चली। शुरुआत में बोटिंग एरिया भी है जो मानसून की वजह से बंद था । बस लोहे के जाली के दरवाजे खुलवाती हुई चली और शेर और टाइगर के दर्शन कराए जो लोहे की बड़ी बड़ी जालियों में विचरण कर रहे थे । रास्ते में आपको स्पाटिड डिअर, नील गाय आदि जानवर भी खुले में घूमते मिलेंगे। उसने वापस टिकट काउन्टर पर लाकर उतार दिया । 

चलिए दोस्तों मैँ आपको फिर लेकर चलूँगा कुछ जानी पहचानी गलियों में, कुछ अनजानी गलियों में, कुछ घूमे हुये शहरों में , कुछ नए इलाकों में , कुछ अलग घुमक्कड़ी के साथ ।  

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तब तक के लिए अभिवादन । 









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