Wednesday, October 14, 2026

कोवलम की उछलती लहरों से एलेप्पी के खामोश बेकवाटर तक (Kerala Trip - Kovalam to Alleppey Back Waters)

 

                           


06.11.2025

कन्याकुमारी का सूर्यास्त, रात्रि विश्राम देखकर हम सुबह होटल गोपीनिवास में नाश्ता करके निकलगए पद्मनाभपुरम पैलेस Padmanabhapuram Palace (भगवान विष्णु का शहर) के लिए, नागरकोइल होते हुए , जोकि एक ऐतिहासिक कस्बा/गाँव, कन्याकुमारी जिले के कलकुलम गाँव में है जो थुकलाई के पास है। भौगोलिक दृष्टि से यह जगह कन्याकुमारी (तमिलनाडु) के अंदर है लेकिन इसका देखरेख और प्रशासन केरल सरकार के अधीन है, किसी समय कन्याकुमारी केरल राज्य का हिस्सा था। छोटी सी शांत जगह, बाहर खेल खिलौनों, दैनिक सामान, नारियलपानी आदि की दुकानें, एक अलग तरह का छोटा नारियल उसका स्वादिस्ट पानी और मलाई एक गिलास में हमने लिया, पीकर सुखद ताजगी महसूस हुई। अंदर घुसकर, विशाल पेड़ों की छाया, बाई तरफ से एंट्री टिकट लिया। बाहर से एकदम साधारण बनावट। (फोटो नीचे देखें)।

यह एशिया का सबसे बड़ा लकड़ी का पैलेस है जिसमें 14 छोटे बड़े महल है जिसे 1601 ईस्वी में बनवाया गया था । कहते है कि यह स्थान त्रावणकोर (वेनाड) की लगभग 300 साल राजधानी रही थी। पूरा एक चलता फिरता नगर, राजसी शानों शौकत, चारों तरफ चहल पहल, घोड़ों की टपा टप कदमताल, तलवारों की खनकार, राजसी आदेशों की गूंज, भगवान के मंदिरों की घंटियाँ और गूँजती आरतियाँ। ऊपर, नीचे, किसी महल में शयन के इस्तेमाल के बेड, किसी में कुर्सी, झूलें, किसी में बर्तन, किसी में मुराल पेंटिंगस, किसी में मूर्तियाँ, लकड़ी की गजब नक्काशीयां, खूबसूरत लकड़ी का काम, सबसे ज्यादा आकर्षक राजा के वो लकड़ी के हाल (डाइनिंग हाल) जहाँ प्रजा के 2000 लोगों को एक साथ मुफ़्त खाना बनाने और खिलाने की व्यवस्था। इस जगह की ऊर्जा, वायुमंडल, एक अलग अनुभूति, एक अलग एहसास।(फोटो नीचे देखें) कुछ पुण्य कर्मों का फल हुये। 

एक युग, एक अतीत, एक वैभव की सुहानी और सुखद याद दिलाता हुआ यह महल उस शान शौकत की कहानी कहता हुआ खामोश खड़ा है । 

यहाँ से चल दिए हम आजिमाला शिव मंदिर (Aazhimala Shiv Temple) के लिए जहाँ शिव जी गंगाधरेश्वर की विशालतम प्रतिमा में विराजमान है, समुद्र के किनारे ,गुफा के अंदर बना हुआ एक अद्भुत मंदिर (फोटो नीचे देखें)

इसके बाद लगभग चार बजे , हम आगये केरल के खूबसूरत कोवलम बीच पर अपने होटल – द निलाकांत बीच रिज़ॉर्ट (kovalam), होटल से कुछ पहले राजेश ड्राइवर ने गाड़ी खड़ी कर दी और होटल के रीसेप्शन पर फोन कर दिया, थोड़ी ही देर में दो सहायक आ गए और कुछ सीढ़ियाँ उतरकर हमारे आगे आगे चल दिए। समुद्र के किनारे किनारे होटल बने हुये हैं। समुद्र और होटल की एंट्री के बीच एक छोटी सी सड़क है। दूर तक फैला हुआ अथाह समुद्र, विदेशी सैलानी नंगे पैर समुद्री रेत पर चलते हुए, छोटे बड़े जहाज आते जाते हुए , लहरों की करतल ध्वनि। (विहंगम दृश्य का विडिओ)।

होटल पर कुछ  विश्राम करके, चाय वगैरह पी कर हम शाम को निकल पड़े पद्मनाभ स्वामी मंदिर (Padmanabh Swami Temple) के लिए, हाँ जाने से पहले नेट पर पोशाक/कपड़े क्या पहनने होंगे की झानबीन शुरू की गई। ड्राइवर साहब से भी इस बारे में बात की गई। राजेश ने मंदिर के प्रांगण से पहले लगे मार्केट में हमे छोड़ दिया, वहाँ से हमने तीन/चार  धोतियाँ खरीद ली।छाती पर कोई वस्त्र ना लेकर मैंने एक धोती को ओढ़ लिया। तत्पश्चात, हमने मंदिर में प्रवेश किया और लाइन में लग गए। पद्मनाभ स्वामी मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है जिसे भारत का दिव्य देशम भी कहते है। मंदिर का गर्भगृह एक चट्टान पर स्थित है और भगवान विष्णु की लगभग 18 फीट लंबी प्रतिमा है जिसे तीन दरवाजों से देखना होता है, पहले दरवाजे से भगवान के चरण दिखाई देते है, दूसरे दरवाजे से हाथ और सीना, और तीसरे दरवाजे से भगवान का अलौकिक श्याम वर्ण मुख और आभामंडल, चीर विश्राम की अवस्था में, यह आभास, यह दर्शन दिव्य है और अवर्णनीय है, जिन्हें आप केवल महसूस करेंगे, मैँ कुछ लम्हों के लिए स्तब्ध रह गया। श्रीमती जी को सही से दर्शन नही हो पायें क्योंकि अपार भीड़ होती है और बहुत मंद रोशनी है, अतः हम पुनः लाइन में लग गए और तब सही से दर्शन किये।

उसके पश्चात हमने दीप जलाकर दीप दान किया। प्रसाद लिया और गुड़ की खीर का एक टीन पैक्ड प्रसाद भी घर के लिए लिया। अंदर विभिन्न देवी देवताओं की कलाकृतियाँ हैं। बड़े गलियारे को पार करके हम बाहर की तरफ आ गए लेकिन निकासी से पहले अद्भुत भरनाट्यम नृत्य को सीखने वाली विद्यार्थियों ने अपने नृत्य से समाँ बांध दिया। कहते है कि नृत्य की शिक्षा पूरी होने के बाद पहली प्रस्तुति भगवान को अर्पित की जाती है। शाम के समय मुख्य बाहरी दरवाजे की छटा निराली है। (फोटो नीचे देखें)

दर्शन करके हम अपने होटल आ गए, रात्रि का खूबसूरत समंदर का नजारा,  बीच की सड़क पर रात्रि में फिश मार्केट लग जाता हैं।

सुबह सुबह समुद्री रेत पर पैदल चलना सुहाना लगता है, मछुआरों की एक पूरी टीम लगभग 15/20 जनों की जाल लेकर जाने की तैयारी करते हुये, हमारे दाई तरफ कोवलम का पुराना लाइटहाउस (Kovalam Old  Lighthouse), यह खूबसूरत नीली और सफेद धारियों वाला टावर आज भी स्थित है। (फोटो नीचे देखें)

इस लाइट हाउस के पास, सुबह सुबह समन्दर का नजारा, ताजगी भरी तेज हवायें, किनारे किनारे चहलकदमी, चट्टानों पर बैठकर उछलती कूदती लहरों से बातचीत करना, समंदर की  लहरों के साथ नहाना, यह नजारा अद्भुत हैं। 

तैयार होकर हम रेस्टोरेंट में ब्रेकफ़ास्ट के लिए आगए, स्वादिस्ट नाश्ते में साउथ इंडियन के साथ साथ नॉर्थ  इंडियन पूरी सब्जी, फ्रूट्स, जूस, लाजवाब , लजीज और बाहर समंदर का दिलकश नजारा और खुला नीला आसमान दोनों एक होते हुए , कोवलम बीच - मनभावन। (फोटो नीचे देखें)।

कोवलम से सामान पैक करके हम निकल गए केरल के खूबसूरत एलेप्पी (Alleppey) में रहने के लिये। हाउस बोट से फोन आ गया कि आप खाने (लंच) में क्या खाएंगें। सफर में लंबे समय तक साउथ इंडियन खाने के बाद हमने उन्हें दाल, सब्जी, भात, बनाने के लिए बोल दिया। राजेश ने लगभग 12 बजे हमें एलेप्पी छोड़ दिया और सारा सामान हाउस बोट के हवाले कर दिया, हमने राजेश का शुक्रिया किया। एलेप्पी का समुद्री सफर शुरू हो गया।  :-  

थोड़ी दूर चलने के बाद लगा कि एक अलग दुनिया, एक समंदर के पानी से निकली हुई बेकवाटर की अलग कल्पना, बोट पर ही घर की सारी सुविधाएं, तीन बज गये थे और भूख भी लग रही थी, उन्होनें बोट पर डाइनिंग टेबल पर शानदार और लजीज नॉर्थ इंडियन गरमा गरम खाना लगा दिया, खाकर एक अलग तृप्ति। (फोटो नीचे देखें)।

लहरों के साथ चलते चलते अलग अलग बेहद हसीन नजारें, रमणीय स्थल, समंदर के बैक वाटर से बना शांत जलमार्गों पर चलता गाँव/शहर, आपको महसूस हो जाएगा कि यूँ ही इसे पूर्व का वेनिस नही कहा जाता है। अलग अलग तरह के हाउसबोट छोटे बड़े, ग्रुप के लिए अलग, तरह तरह की सुविधाओं से सम्पन्न, मिलनसार व्यवहार।

शाम को चाय के साथ बेहद करारी पकोड़ियाँ फिजा को और रंगीन बनाते हुये थी। रात्रि में उन्होंने हाउसबोट को अपने घर के बाहर खड़ा कर दिया ताकि वो रात्रि विश्राम अपने घर पर कर सके और हम हाउसबोट में, चाँदनी रात के सन्नाटे में एक अलग अनुभव, एलेप्पी के नीरव और शांत समंदर के साथ ले सके।

सुबह मंदिर की घंटियों और पक्षियों की चहचाहट ने सुबह का स्वागत किया। वापसी के सफर के नजारें भी मानलुभावने हैं। बीच में आपको स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया का वाटर स्पोर्ट्स सेंटर भी दिखाई देगा - यह प्रसिद्ध पुन्नामदा (Punnamada) बैकवाटर्स के पास स्थित है। यहाँ मुख्य रूप से कयाकिंग, कैनोइंग और रोइंग (नौकायन) जैसे वाटर स्पोर्ट्स के लिए एथलीटों को राष्ट्रीय स्तर की प्रोफेशनल ट्रेनिंग दी जाती है। 


सुबह का नाश्ता कराकर हाउस बोट ने हमें किनारे छोड़ दिया जहाँ हमारी टैक्सी कोचीन के लिए इंतजार कर रही थी जहाँ से हमारी दिल्ली के लिए फ्लाइट थी। शार्प टूर एण्ड ट्रैवल के सहयोग से एक शानदार दक्षिण भारत का ट्रिप यादगार बन गया।

चलिए दोस्तों आपको फिर ले चलूँगा बचपन, जवानी की कुछ जानी पहचानी, कुछ अनजानी , कुछ सुनसान गलियों में, मोहल्लों में, एक नए शहर, नए देहात, नए कस्बे, नए गाँव, नए पर्यटन स्थल के साथ, यात्राओं के इस अनवरत सफर पर।

तब तक के लिए अलविदा, अभिवादन । 




Tuesday, October 6, 2026

मुंबई का खूबसूरत मानसूनी हिल स्टेशन (कृष्णागिरी) Monsoon Hill Station of Mumbai

       मुंबई का खूबसूरत मानसूनी हिल स्टेशन (कृष्णागिरी) Monsoon Hill Station of Mumbai 

यूं तो मुंबई के आस पास बहुत सारे हिल स्टेशन है और मुंबई में कुछ खूबसूरत किले भी हैं, अपनी बहन और भांजे के पास रात्रि में राखी बँधवाकर और विश्राम कर, सुबह मैँ नाश्ता वगैरह करके कैब बुक करके निकल पड़ा कृष्णागिरी की यात्रा के लिए, पवई से निकलकर थोड़ी देर में कैब आरे फॉरेस्ट में चल पड़ी दोनों तरफ हरा भरा जंगल जिन्हें देखकर आप कह नहीं सकते कि क्या आप मुंबई में सफर कर रहे है, हाँ पतली सड़क पर वाहनों की भीड़ , काले पीले ऑटो को देखकर आप ज्यादा देर भ्रम में भी नहीं रह सकते,लेकिन दोनों तरफ की हरियाली अद्भुत हैं। टैक्सी ड्राइवर ने बताया कि ,पीछे, इस आरे फॉरेस्ट को बचाने के लिए वहाँ के निवासियों ने काफी प्रोटेस्ट किया था। ईश्वर करे मुंबईवासियों की ऑक्सीजन की यह नली इनके शरीर से ना हटाई जायें। (फोटो एवं विडिओ नीचे देखे)

                                              (शुरुआत आरे फॉरेस्ट की हरियाली से - अगस्त 2026)                                    फॉरेस्ट पार करते ही दोनों तरफ गगनचुंबी इमारतें, तेज फर्राटा भरती हुई गाड़ियाँ, एक तरफ दौड़ती हुई मेट्रो का पुल, गाड़ी ने यू टर्न लेकर मुझे बोरीवली में स्थित संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के बाहर मुझे छोड़ दिया , जहाँ दरवाजे के ठीक सामने, सड़क के दूसरी तरफ मेट्रो का स्टॉप भी है। मैंने प्रवेश का टिकट रुपये 113 का लिया और अंदर प्रवेश करके सबसे पहले कृष्णागिरी  यानि कन्हेरी गुफाओं का ई बग्गी का 150 रुपये का टिकट लिया (फोटो नीचे देखे) क्योंकि गुफा लगभग 7 किलोमीटर दूर है। यहाँ से बसे भी चलती है जिसका किराया 100 रुपये प्रति सवारी है और चाहे  तो आप पैदल सफर भी कर सकते है। जैसे ही सफर शुरू हुआ हरियाली बरसात के बाद भीगे हुये चमकीले हरे वन क्षेत्र, बीच बीच में पानी के श्रोत, काले घने भारी पानी भर के चलते हुये मेघ, बग्गी में लगती हुई शां शां हवाएं, भीगा भागा दिलकश सफर।  

ई बग्गी गुफाओं से लगभग 1 किलोमीटर पहले ही उतार देती है उसके बाद का सफर पैदल जंगल के बीच बनी हुई पक्की सड़क पर, थोड़ा घुमावदार थोड़ा चढ़ावदार, बंदरों, लंगूरों, सुरीले पक्षियों के बीच, ट्रैकिंग का अच्छा खासा जंगली अनुभव (फोटो नीचे देखें) दूसरे रहगुजरों के साथ और यहीं से आपको एक हिल स्टेशन की शुरुआत महसूस होगी। 

                                    घुमावदार दिलकश हल्की चढ़ाई का सफर (अगस्त 2026) 

                                                   इस पहाड़ी सफर की ट्रैकिंग का विडिओ   

सीढ़ियाँ चढ़कर (फोटो नीचे देखे) टिकट खिड़की है और उसके पश्चात विस्व प्रसिद्ध कान्हेरी गुफ़ाएं – मुंबई का छुपा हुआ खजाना या लुप्त होती हुई धरोहर या प्राण वायु। 

आपके दाहिनी तरफ कृष्णागिरी की चट्टानों पर उकेरित गुफ़ाएं और बाईं तरफ एक हरियाला अद्भुत नजारा जो किसी भी हिल स्टेशन को टक्कर कर देने के लिए सक्षम है। कहते हैं कि ज्वालामुखी के काले लावे से बनी चट्टानों को काटकर निर्मित होने के कारण इस पहाड़ी का नाम कृष्णागिरी पड़ा।


  मानसूनी हिल स्टेशन के नजारे का विडिओ 

इस भागती दौड़ती मुंबई के लिये प्रकृति से रूबरू होने का, अपने अतीत को ढूँढने का या अपने आप को ढूँढने के लिए महात्मा बुद्ध की व्याखानों का, उपदेश का, संदेश का , बहुत बड़ा मूक श्रोत - कान्हेरी की गुफ़ाएं। सदियों पुरानी सभ्यता, और उनके तौर तरीकों को उन निगाहों से देखना, समझना और महसूस करना बहुत अद्भुत है। प्रकृति के बीच पत्थरों को तराश के बनाया हुआ विश्वविद्यालय, एक सभ्यता, उनकी मूक और अंकित भाषा, उनके दर्शाये गये हाव भाव, कुछ कहते हुये और कुछ मौन रह कर भी आपको सोचने के लिए मजबूर करते हुये।

ऊपर पहुँचने पर पहली गुफा के बाहर गार्ड ने बताया कि लगभग 110 गुफ़ाएं हैं और हर गुफा के बाहर एक पानी का कुंड है जो भिक्षुओं की पानी की आवश्यकता के लिए पर्याप्त होता था । इन गुफाओं का निर्माण प्रथम शताब्दी ईस्वी से ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य हुआ था। गुफ़ाएं भगवान बुध के हीनयान और महायान दोनो मतों का उल्लेख करती है। हीनयान यानि जहां बुद्ध प्रतीकात्मक रूप में है जैसे स्तूप, बोधिवृक्ष, पदचिन्ह आदि। परन्तु बाद के काल की महायान गुफाओं में बुद्ध को प्रतिमाओं के रूप में भिन्न भिन्न मुद्राओं में दिखाया गया है।

गुफा संख्या 1 एवं 2 और बुध स्तूप (फोटो नीचे देखे) 


गुफा संख्या 3  चैत्य हाल (फोटो नीचे देखे)

                           कहा जाता है दान दाताओं की मूर्तियाँ (ऊपर) 

अद्भुत है इसके प्रवेश पर के बाद दोनों तरफ द्वारपाल है और फिर दोनों तरफ बुद्ध की विशाल गढ़ी हुई प्रतिमाएं जिनमे प्रतिमाओं के हाथ खुले और नीचे की ओर है शायद इशारा है कि जिंदगी एक खुली किताब है और मनुष्य को जमीनी हकीकत से जुड़े रहना चाहिए क्योंकि जीवन क्षणभंगुर है और अंतोतगत्वा यही मिट्टी हमारी परिणति है। इसके हाल में मैंने भी गार्ड के सिखाने और बताने पर ॐ का उच्चारण किया तो ध्वनि गुंजायमान थी, अद्भुत, लगता है यह स्थान किसी साधना, किसी आस्था से सिंचित है। लगता है कि प्राचीन काल में भी समाज का एक हिस्सा जो आध्यात्म, मानसिक शांति, ध्यान, एकाग्रता से जुड़ा होता था और वो लोग इस ज्ञान को आगे फैलाते थे मतलब भारत का समाज हर युग में शांति और सरलता को महत्व देता था । 

तमाम गुफाओं के लिए छोटी छोटी सीढ़ियों से बनाये गये उतार चढ़ाव वाले रास्ते और मध्य में बहता हुआ जल श्रोत, दूर तक फैला हुआ सघन, निस्तब्ध हरा भरा वन क्षेत्र, झरनों की कल कल, शिक्षा और दीक्षा एवं आश्रय तीनों के लिए माकूल स्थल।


गुफा संख्या 67

थोड़ी सी चढ़ाई थी और बारिश की वजह से रास्ते में हल्की सी फिसलन, गार्ड ने दूर से बताया की आराम से पकड़कर चढ़ जाइए, उधर से भी आप नीचे आ पाएंगे , देखा तो सामने गुफा नंबर 67 आ गई, बहुत सुंदर बुद्ध के चित्र अलग अलग मुद्राओं , अलग अलग दशाओं में, जीवन के विभिन्न रूपों को दर्शाते हुये :- 



चारों तरफ गुफाओं का एक अंतहीन सिलसिला, ऊपर नीचे, दायें बाएं, एक पूरी संस्कृति, एक पूरा समाज, एक समय चलता फिरता ,चहल पहल से भरा हुआ, भिक्षुकों से भरा हुआ, शिक्षकों से भरा हुआ, रहने के लिए सारी व्यवस्थाओं से भरा हुआ, आज एक बिल्कुल निस्तब्ध पहाड़ी, शायद उन इशारों  उन संदेशों को पढ़ने समझने में एक पूरा जमाना निकल जाये। हमारे पूर्वजों की एक अनमोल धरोहर, अमूल्य विरासत, अथक एवं अपार मेहनत या तपस्या जो उन्होनें झुलसती धूप, गरजती बरसातों में की थी इनको गढ़ने के लिए, जल संचयन की कारगर व्यवस्था बनाने के लिए, प्रकाश की समुचित व्यवस्था करने के लिए, एक रूप देने के लिए, अपनी मूक भाषा बोलते हुये आज भी खड़ी हैं उसी धूप और बरसातों से बेपरवाह, बताते हैं कि लकड़ी की कई नक्काशीयां, काफी सामान खराब हो चुका हैं। ये गुफ़ाएं जीते जागते एहसास का एक विलक्षण उदाहरण हैं जिसकों सँजोकर रखना अब हमारी जिम्मेदारी हैं। 

मुझे यह मुंबई के भीतर भीड़ भाड़ से दूर एक बेहद शांत, बात करने वाला, मन को सुकून देने वाला और मनोरम मानसूनी हिल स्टेशन लगता है हालांकि मुंबई से बाहर और आसपास बेहद खूबसूरत मूक पहाड़ियाँ और हिल स्टेशन हैं । 


           संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान, बोरिवली के जंगल का विहंगम दृश्य और सुदूर मुंबई की इमारतें 
इस सुहाने और मदमस्त सफर और एक संस्कृति, धर्म और विरासत को मन में समाए हुये नीचे उतर आया जहाँ खाने पीने, शिकंजी, स्नैक्स, मेगी आदि की सुविधाएं हैं। वहाँ से पुनः लगभग 1 किलोमीटर का हरियाला ट्रैक, कहीं कहीं बंदरों/ लंगूरों के साथ, सुंदर और दुर्लभ पक्षियों की गूंज के साथ, पार करते हुये मैं उस जगह आ गया जहाँ मुझे ई बग्गी ने छोड़ा था । लेकिन अभी वहाँ पर कोई ई बग्गी नही थी, हाँ एक बस जा रही थी, मैंने ड्राइवर को दूर से इशारा किया तो उसने साइड मिरर में देखकर बस रोक ली। लगभग 6 किलोमीटर का सुहाना सफर कराते हुये बस ने मुझे टिकट काउन्टर के पास छोड़ दिया। मैंने टिकट काउन्टर पर लॉयन सफारी का टिकट मांगा तो उन्होंने बताया कि टिकट दोपहर 2 बजे मिलेगा और अभी 1.15 हो रहा था । 

ऐसे में मैंने भी लंच करना उचित समझा और पास में बनी टेबल कुर्सी पर बैठकर दीदी के यहाँ बनी बेसन के गट्टे की सब्जी, बारीक बारीक हरे केर की कूटकर बनाई हुई दुर्लभ राजस्थानी सब्जी ,चपाती के साथ खाई, मजा आ गया । अभी कुछ स्कूल के बच्चों के ट्रिप आ गए थे और छह में से तीन बसें संचालन के लिए ड्राइवर की छुट्टियों की वजह से बंद थी । इसलिए , हमारी बस लगभग तीन बजे चली और वो पहाड़ी क्षेत्र के बाईं ओर चली। शुरुआत में बोटिंग एरिया भी है जो मानसून की वजह से बंद था । बस लोहे के जाली के दरवाजे खुलवाती हुई चली और शेर और टाइगर के दर्शन कराए जो लोहे की बड़ी बड़ी जालियों में विचरण कर रहे थे । रास्ते में आपको स्पाटिड डिअर, नील गाय आदि जानवर भी खुले में घूमते मिलेंगे। उसने वापस टिकट काउन्टर पर लाकर उतार दिया । 

चलिए दोस्तों मैँ आपको फिर लेकर चलूँगा कुछ जानी पहचानी गलियों में, कुछ अनजानी गलियों में, कुछ घूमे हुये शहरों में , कुछ नए इलाकों में , कुछ अलग घुमक्कड़ी के साथ ।  

मेरे नए और पुराने लेखों के लिए मेरी वेबसाईट Galiyara07.com विजिट करें। 

तब तक के लिए अभिवादन । 









Thursday, October 1, 2026

पंबन ब्रिज से दक्षिण भारत (कन्याकुमारी) की रोमांचक यात्रा (Travelling from Pamban Bridge to Kanyakumari)

 

पंबन ब्रिज से दक्षिण भारत (कन्याकुमारी) की रोमांचक यात्रा (Travelling from Pamban Bridge to Kanyakumari) 

दक्षिण भारत की यात्रा काफी लंबे समय से स्थगित थी , अतः सोचा कि वहाँ की यात्रा रोमांचक और धार्मिक दोनों तरीकों से कर ली जाए । दूर की यात्रा होने की वजह से यह सोचा गया कि किसी ट्रैवल एजेंसी की सहायता ले ली जाए ताकि समय का सदुपयोग हो और यात्रा आरामदायक भी हो जाए। ऐसे में शार्प ट्रैवल, दिल्ली (Sharp  Travels India Limited - Delhi) की मदद ली गई जिन्होंने काफी बातचीत और विचार-विमर्श के बाद, हमारे हिसाब से रहन-सहन और घूमने के स्थान तय करके हमें एक 5-6 दिनों का यात्रा कार्यक्रम (Itinerary) बनाकर भेज दिया।इसी के आधार पर हमनें दिल्ली से मदुरै की सुबह जल्दी की फ्लाइट बुक कर दी थी। 1 नवम्बर 2025 को हमनें ऑफिस से घर आकर यात्रा की सारी पैकिंग कर ली ।

2 नवम्बर 2025

सुबह जल्दी एयरपोर्ट पहुँचकर 5 बजे की फ्लाइट ले ली । मदुरै में राजेश (टैक्सी ड्राइवर) एयरपोर्ट पर उपलब्ध था जो सीधे हमें होटल ले गया । पोपी’ज होटल सुन्दर और सुविधाजनक था, नाश्ता वगैरह करके हम मदुरै की यात्रा पर निकल पड़े । सबसे पहले सबसे मशहूर मीनाक्षी टेम्पल गए जहां राजेश ने मंदिर से पहले एक तरफ गाड़ी लगा दी । मंदिर के चारों दिशाओं में चार प्रवेश द्वार जिन पर देवी-देवताओं, जानवरों, संतों की कृतियाँ हैं, जो काफी रंगीन और खूबसूरत हैं । यह मंदिर माता मीनाक्षी जो माँ पार्वती का रूप है उनको और शिव जी को समर्पित है। अंदर कैमरा और मोबाईल ले जाना मना हैं । हमनें बाहर से ही प्रसाद ,फूल ले लिए । मंदिर में लगभग 1000 स्तम्भ हैं जिन पर द्रविड़ शैली की नक्काशी है, जो बहुत सुंदर है । मंदिर में माता रानी और शिव जी के दर्शन किए, विशाल ऊंचा मंदिर और फिर आसपास मार्केट । लौटने में जूते चप्पल ढूँढने में मुश्किल हुई अतः ध्यान रखें कि हमने चप्पल किस दिशा के द्वार के पास उतारी हैं।

वहाँ से हम चल दिए – तिरुमलई नायक पैलेस - इसका निर्माण मदुरै के राजा तिरुमाला नायक ने 16वीं शताब्दी में करवाया था। कहा जाता है कि इसके निर्माण में मुख्य योगदान इटली के एक वास्तुकार का था। इसी वजह से आप जब इसकी भव्यता, नक्काशी, इमारत को देखते हैं तो आपको द्रविड़-इतालवी वास्तुकला का संगम महसूस होता है। अंग्रेजों ने इसका विभिन्न प्रशासनिक कार्यों के लिए भी उपयोग किया और उसके बाद 1970 तक इसका उपयोग जिला न्यायालय के लिए भी किया गया। शाम को यहाँ लाइट एण्ड साउन्ड शो होता है जिसमें राजा के जीवन और उनके मदुरै में शासन के बारे में बताया जाता है। (फोटो नीचे देखें)

यूँ तो मदुरै मंदिरों का शहर है परंतु इसके बाद हम चल दिए योग नरसिम्हा पेरुमल मंदिर जो मदुरै से लगभग 8 किलोमीटर दूर है और जो विष्णु भगवान के शक्तिशाली अवतार भगवान नरसिम्हा जी को समर्पित है। पहाड़ी को काटकर बनाया गया यह एक गुफा मंदिर है, पहाड़ी की चढ़ाई मनोरम है। सामने तालाब है जहाँ आप मछलियों को दाना डाल सकते हैं । बाहर एक सज्जन सजीव चित्रकारी करते हुए मिले। 

3 नवम्बर 2025

अगले दिन बुफे ब्रेकफास्ट करके हम लोग टैक्सी से निकल गए रामेश्वरम के लिए । रास्ते में हम चाय आदि के लिए भी रुके । रास्ते में दिशा-निर्देश और अन्य बोर्ड स्थानीय भाषा में हैं । दोपहर को एक जगह रेस्टोरेंट में खाने के लिए रुके, काफी भीड़ थी । हमने अपनी आदत के अनुसार चपाती, आलू गोभी की सब्जी, दाल, इत्यादि बोल दिया। वहाँ बैठे अधिकतर सभी लोग साउथ इंडियन थाली खा रहे थे। आलू गोभी की रसेदार सब्जी को देखते ही माथा ठनक गया, और हमें दाल के साथ खाना खाना पड़ा । लगा कि गलत ऑर्डर कर दिया गया और समझ आया कि आप यहाँ दक्षिण भारतीय व्यंजनों का लुत्फ लीजिए। 

दोस्तों (विशेष तौर पर अभिषेक जी - पी एन बी) से दक्षिण की यात्रा के बारे में जब भी अनुभव साझा किया तो उन्होंने बताया कि पंबन ब्रिज देखने और महसूस करने की रोमांचक जगह है, समंदर के ऊपर बहुत लंबा पुल जो दोनों तरफ से खुला हुआ, केवल एक पटरी पर ट्रेन चल रही है, दोनों तरफ का दृश्य आपकी धड़कनें बढ़ाने के लिए काफी है। टैक्सी रामेश्वरम से पहले आने वाले पंबन ब्रिज के सड़क वाले पुल पर आ गई थी , जहां से दोनों तरफ समंदर का नजारा बहुत खूबसूरत है, एक तरफ रेलवे का ऐतिहासिक ब्रिज है। मन में इच्छा हुई कि ट्रेन का सफर रेलवे ब्रिज के ऊपर से किया जाए जो दोस्तों ने बताया था । परन्तु चेक करने पर पता चला कि इस समय मदुरै की दिशा से रामेश्वरम के लिए कोई पैसेंजर ट्रेन नहीं है। हाँ , लेकिन इसी समय पंबन रेलवे पुल के ऊपर से एक ट्रेन जा रही थी और नए एवं पुराने पुल को देखना अद्भुत था (फोटो नीचे देखें)  

पंबन ब्रिज पार करने के बाद, हम रामेश्वरम लगभग दो बजे के आसपास पहुँच गए । चलते हुए रास्ते में हमने देखा ऐसी शख्सियत का घर जिनके आगे सम्मान, श्रद्धा और इज्जत से सिर झुक जाता है, जी हाँ, मैँ बात कर रहा हूँ भारत के श्री ए पी जे अब्दुल कलाम जी की, उनके व्यक्तित्व से मेल खाता उनका साधारण घर (फोटो नीचे देखें ) जहां उनकी तस्वीरें , पुरस्कार आदि रखे हैं। थोड़ी दूर पर उनका म्यूजियम भी है जहाँ उनके योगदान , देश सेवा की तस्वीरें, अवॉर्ड, मेडल आदि हैं। 

इसके बाद हम चले गए भारत के दक्षिणी छोर के लिए जहां से श्रीलंका महज 18-20 किलोमीटर रह जाता है यानि धनुषकोडी के लिए, जिसके एक तरफ बंगाल की खाड़ी और एक तरफ हिन्द महासागर और अंत में उनका मिलन। रामेश्वरम से यहाँ तक का यात्रा मार्ग बहुत सुहावना है। कहते हैं कि कभी यहाँ पर रेलवे स्टेशन, पोस्ट ऑफिस, अस्पताल आदि के साथ एक बसा हुआ चलता फिरता शहर था और यहाँ से सीलोन (श्रीलंका) और अन्य देशों के लिए जल मार्ग आसान और सुगम था और व्यापारिक गतिविधियों के लिए उत्तम भी था । लेकिन 1964 में आए समुद्री तूफान ने पूरा शहर बर्बाद कर दिया और बर्बादी के कुछ बचे-खुचे निशान आज भी कहीं-कहीं मिल जाते हैं जिन्हें देखकर दुख लगता है और मन काँप जाता है उस मंजर को याद करके। धनुषकोडी का अर्थ धनुष की नोक है और कहा जाता है कि यहीं पर श्री भगवान राम ने अपने सैनिकों को धनुष की नोक की तरफ इशारा करते हुए समुद्र पर पुल बनाने के लिए कहा था। कहा जाता है कि यहीं से राम सेतु का प्रारंभ हुआ था परन्तु प्राकृतिक आपदाओं के कारण अब यह समुद्र में डूब गया है। इस छोर का नजारा अद्भुत है चारों तरफ नीला विस्तृत खुला आसमान और बिना छोर का दूर तक फैला हुआ नीला समंदर, दोनों किसी अनजान जगह पर मिलते हुए , हमारी सीमाओं की रक्षा करते हुए। अशोक स्तम्भ के साथ बना हुआ भारत का आखिरी पड़ाव, आखिरी सीमा।पहले चले गए हिंदुस्तान का आखिरी किनारा /सीमा देखने, जहां पर आपके मोबाइल में मैसेज आ जाएगा एयरटेल की तरफ से कि हम आपका श्रीलंका में स्वागत करते है मतलब वहाँ शायद श्रीलंका के टॉवर सिग्नल कैच करने लगते हैं। वहाँ आप दूरबीन से श्रीलंका के कुछ दृश्य ,दीवार आदि देख सकते हैं। आसपास छोटे छोटे स्टॉल लगे हुए हैं, मुझे सबसे ज्यादा पसंद अनानास की लंबी लंबी फाँके, जो पेट के लिए फायदेमंद और स्वादिष्ट, खाना सही लगा। आसपास राम जी और हनुमान जी के मंदिर भी हैं। 

                                             भारत का अंतिम छोर (धनुषकोडी ) 
वहाँ से हम आ गए रामेश्वर मंदिर के पीछे की तरफ जहां समंदर है और जहाँ परंपरा के हिसाब से आपको स्नान करना होता है । हमनें भी वहाँ स्नान किया और चल पड़े मंदिर की तरफ । टिकट लेकर आप लाइन में लग जाइए ताकि आप 22 कुंडों का स्नान कर सकें । पहले से वहाँ हर कुंड पर पंडित जी हैं जो हर कुंड से बाल्टी से पानी निकालकर आपके ऊपर डालते हैं स्नान हेतु । यह अनोखा स्नान है और बड़ा अच्छा भी लगता है। फिर आप कपड़े बदलकर मंदिर के मुख्य प्रांगण में दर्शन के लिए लाइन में लग सकते हैं । अंदर की कलाकृतियाँ और मूर्तियाँ देखने लायक हैं । मुख्य शिवलिंग के दर्शन दूर से और थोड़े अंधकारमय वातावरण में होते हैं  जहाँ  दीपक की मंद रोशनी ध्यान की एकाग्रता में मदद कर रही थी। कहते है श्री राम जी ने यहीं आकर शिव भगवान की स्तुति और आराधना की थी। मंदिर के अंदर गलियारे की नक्काशी और वास्तुकला देखने लायक है।


                                 रामेश्वरम मंदिर के दर्शन 

मंदिर के बाहर खाने पीने, जूस , सामान आदि की दुकानें हैं। मंदिर से निकल कर दिमाग सुबह ट्रेन से पंबन ब्रिज की यात्रा करने के लिए कसमसाने लगा। होटल आकर खाना खाया जो कि स्वादिष्ट था । रेलवे की समय सारिणी देखी तो पता चला कि सुबह 5.40 बजे रामेश्वरम रेलवे स्टेशन से ट्रेन है। हमारे होटल विन्यागा बाय  पापीस से रेलवे स्टेशन महज 150 मीटर की दूरी पर है यह हमारे लिए हौसला बढ़ाने वाली बात थी। एहतियात के तौर पर हमनें राजेश को भी बोल दिया कि सुबह जल्दी उठ जाना और यह प्रोग्राम तय हुआ कि हम रामेश्वरम से मंडपम तक रेलवे की यात्रा करेंगे और चूँकि मंडपम रेलवे स्टेशन ऑन रोड ही है तो वहाँ राजेश गाड़ी लेकर आ जाएगा ताकि हम वापस उनके साथ रामेश्वरम होटल आ जाएंगे।

4 नवम्बर 2025

सुबह जल्दी उठकर हम निकल गए रेलवे स्टेशन के लिए पैदल ही। हम काफी जल्दी स्टेशन पहुँच गए और टिकट ले ली, छोटा सा साफ-सुथरा रेलवे स्टेशन, पैसेंजर ट्रेन नंबर 06652 रामेश्वरम से मदुरै के लिए चल पड़ी सुबह के 5.40 पर, अगला स्टेशन था पंबन जंक्शन जो कि समंदर से कुछ पहले या यूं कहें कि पंबन ब्रिज से पहले। उसके बाद शुरू होती है वो रोमांचक यात्रा जिसकी बड़ी तमन्ना थी । चारों तरफ लंबा समंदर और बीच में पतले से पुल पर चलती हुई हमारी रेलगाड़ी, काफी थूक थूक वाली यात्रा छुक छुक  में। दोनों तरफ दूर तक नीला समंदर , ऊपर नीला आसमान, तेज हवा के झोंके, पानी को बोट वाला अहसास मगर कुछ डरावना, बेहद रोमांचक। तभी समझ में आया कि पुराना पुल जिसके दोनों तरफ कोई बैरिकेडिंग नहीं थी अब बंद हो गया है। साथ में बैठे एक परिवार से पता चला कि वे इसी ट्रेन से मदुरै जा रहे हैं जहाँ ट्रेन लगभग 9.30 पहुँचेगी।  यात्रा का यह विकल्प भी हमें अच्छा लगा । थोड़ी देर बाद आया मंडपम स्टेशन, आधे घंटे का यह सफर कब खत्म हो गया पता ही नहीं चला लेकिन इसका रोमांचकारी अनुभव अलग ही था जो जिंदगी भर याद रहेगा। कई फिल्मों की शूटिंग का गवाह है यह पंबन ब्रिज। 

रेलवे स्टेशन के बाहर निकले तो देखा राजेश प्रतीक्षा कर रहा था। टैक्सी से हम सड़क यात्रा सूर्योदय के साथ पंबन ब्रिज पार करते हुए रामेश्वरम होटल पर आ गए। 

नाश्ता बुफे में लगा था जहां बहुत स्वादिष्ट और लजीज साउथ इंडियन इडली, डोसा, दाल के पकोड़े थे और साथ में जूस, चाय और कॉफी। फिर हम निकल पड़े अपने अगले पड़ाव के लिए यानि कन्याकुमारी के लिए। रास्ते में तूतीकोरिन शहर भी आता है जो मोतियों का शहर कहलाता है। 
  रास्ते में नमक की खेती के दृश्य - एकदम अलग नजारा हमारे यहाँ की खेती से बिल्कुल जुदा (फोटो नीचे देखें )। 
                      लगभग चार बजे कन्याकुमारी के दर्शन (फोटो नीचे देखें ) 
 

बचपन में सरिता आदि किताबें पढ़ते समय विवेकानंद रॉक टेम्पल के दृश्य देखे थे सो चाहत थी कि एक बार भारत के उस आखिरी मुकाम को भी देखा जाए। कन्याकुमारी पहुँचकर हमने विवेकानंद रॉक मेमोरियल  के लिए फेरी का टिकट लिया और सफर की शुरुआत की। 

हम टिकट लेकर और कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर विवेकानंद रॉक स्मारक के दर्शन के लिए पहुँच गए जहाँ स्वामी विवेकानंद जी ने ध्यान किया था । स्थानीय मान्यता यह भी है कि यहाँ पर कन्याकुमारी देवी के रूप में माता पार्वती ने तपस्या की थी । सागर की लहरों के बीच आप आँखें मूँदकर कुछ लंबी गहरी साँसे लेकर थोड़े समय के लिए शांतचित बैठ सकते हैं, आपको सुखद महसूस होगा। यहीं से शीशे का ब्रिज पार करके दूसरी चट्टान पर संत थिरुवल्लुवर  की विशाल मूर्ति जो की तमिल भाषा के एक महान और अत्यंत प्रतिष्ठित दार्शनिक और कवि हैं, के दर्शन किए । 

इस यात्रा के बाद हम निकल गए कन्याकुमारी के सबसे खूबसूरत सूर्यास्त को देखने के लिए और किनारे पर बैठकर , पता चला कि कन्याकुमारी का सूर्यास्त इतना खूबसूरत क्यों कहा जाता है (नीचे फोटो देखकर महसूस करें)।  

 


                             कन्याकुमारी सूर्यास्त एक - नजारें अनेक 
हमने कन्याकुमारी के लघु मार्केट में कुछ मसाले इत्यादि खरीदे तो अच्छा लगा। रात्रि का नजारा कुछ अलग था (फोटो नीचे देखें)। हमारा होटल गोपीनिवास ग्रांड पास में ही था ।

सुबह उठकर होटल से दाहिनी तरफ जाकर खुली सड़क पर चाय पीने का लुत्फ अलग था और हमारे साथी कौवों को बिस्किट खिलाने का मजा भी अलग था । होटल में दक्षिण भारतीय नाश्ता करके हम चल दिए आगे की दक्षिण भारत यात्रा के लिए।  
दोस्तों जुड़े रहिएगा यात्रा अभी बाकी है, आपको पता चलेगा कि केरल को स्वर्ग क्यों कहा जाता है, हम चलेंगे उन महलों, समुद्र के किनारों और उन अद्भुत जगहों पर जहाँ समय ठहर जाता है। 

मेरे नए और पुराने संस्मरणों के लिए मेरी वेबसाइट Galiyara07.com विजिट करे। 

तब तक के लिए अभिवादन । 


 

 



कोवलम की उछलती लहरों से एलेप्पी के खामोश बेकवाटर तक (Kerala Trip - Kovalam to Alleppey Back Waters)

                              06.11.2025 कन्याकुमारी का सूर्यास्त, रात्रि विश्राम देखकर हम सुबह होटल गोपीनिवास में नाश्ता करके निकलगए पद्म...