Friday, August 28, 2026

पाइन ओक सोसाइटी, भवाली से माल रोड, नैनीताल (उत्तराखंड) (Travel memoir from Bhowali to Nainital)




 

भवाली आजकल नीम करौली बाबा की वजह से काफी चर्चा में है लेकिन भवाली हमारे इतिहास का बहुत बड़ा गवाह है राजनेताओं की वजह से, फल सब्जी मण्डी की वजह से, ‘मधुमती’ फिल्म की शूटिंग की वजह से, घोड़ाखाल सैनिक स्कूल की वजह से और सबसे ज्यादा यहाँ की आबोहवा और यहाँ पर विद्यमान सेनेटोरियम की वजह से जहां पर कमला नेहरू से लेकर ना जाने किस किस बड़ी हस्ती का इलाज हुआ । जब आप इतिहास पढ़ते है तो पता चलता है कि पहले यहाँ (भवाली) पहुँचना कितना मुश्किल था । समय बदला और आज यहाँ पर पहुँचना बहुत ही आसान है । काठगोदाम तक यह रेलवे मार्ग से भी जुड़ा हुआ है । वहाँ से बस, टैक्सी सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं ।

भवाली में चारों तरफ पुराने घर, नए घर, होटल, सोसाइटी फ्लैट्स सब कुछ बना हुआ है । ऐसे में ही बड़े भाई साहब का एक खूबसूरत सोसाइटी पाइन ओक पैराडाइज में भूतल का छोटा सा फ्लैट है। सोसाइटी में इंडिपेंडेंट विला तथा 1 BHK, 2 BHK, 3 BHK सभी तरह के फ्लैट हैं जो कि बाबा नानतीन आश्रम रोड, श्यामखेत के पास है । सोसाइटी समतल जमीन पर ना होकर पहाड़ीनुमा ऊंची नीची सतह पर है जो इसकी खूबसूरती में चार चाँद लगाती है । हमारा फ्लैट सोसाइटी की दाहिनी दिशा में बाउन्ड्री की तरफ है । भैया ने बड़े मन से फ्लैट को करीने से बसा रखा है, जरूरत का हरेक सामान आप याद करो और वो इस फ्लैट में मिलेगा।  

1. 1..पाइन ओक पैराडाइज सोसाइटी,भवाली अंदर का दृश्य– फोटो सौजन्य से मनमोहनजी,सोसाइटी वाले  

पिछले साल गर्मियों में भवाली जाने का कार्यक्रम रेलवे टिकट बुक होने के बावजूद किसी कार्यवश रद्द करना पड़ा था । काफी समय से भवाली रहने का मन हो रहा था । जब भी जंगल की शांति में रहने का मन करे तो बोरिया बिस्तर उठाओ और भवाली आ जाओ । इस बार होली की छुट्टियों  के बाद भवाली आने का कार्यक्रम बन गया ताकि घर की संभाल भी हो सके । यहाँ पर रहने के लिए आपको होम स्टे भी मिल जाएगा।

06.03.2026

काठगोदाम रेलवे स्टेशन उतरने पर हमने (सपत्नीक) पप्पू ड्राइवर भैया को उनकी मारुति टैक्सी के साथ पहले ही बुला रखा था । भवाली बहुत पुराने जमाने से घोड़ाखाल की वजह से भी मशहूर था जोकि 1966 में बना हुआ एक प्रसिद्ध आवासीय सैनिक स्कूल है और दूसरी ओर सैनिक स्कूल को पार करके थोड़ा ऊपर चलते ही गोलू  देवता, जो कि शिव (भैरव) का अवतार हैं, का मंदिर है । सोचा काठगोदाम से निकलकर घर (सोसाइटी) पहुँचने से पहले ही घोड़ाखाल मंदिर के दर्शन कर लेना सही रहेगा, घोड़ाखाल  के लिए आपको भवाली मेन चौराहे तक तो आना ही पड़ता है फिर वहाँ से थोड़ा ऊपर चढ़ाई है, पहले घोड़ाखाल का प्रसिद्ध सैनिक स्कूल आता है उसके बाद मंदिर थोड़ी सी सीढ़ियाँ चढ़कर। मार्च के महीने में दोपहर के समय भी मंदिर में बहुत भीड़ थी, काफी लंबी लाइन भक्तों की थी। अनोखी सी मान्यता है इस मंदिर की, जनता अपने मन की मुराद, ख्वाहिश, परेशानी, दर्द, सब कुछ एक कागज पर लिखकर मंदिर मे टंगी घंटियों पर बांध देते हैं और मुराद पूरी होने पर भैरव जी को घंटी चढ़ा देते हैं। घोड़ाखाल मंदिर से नीचे सड़क पर ही दोनों तरफ लोग अपनी गाड़ियां खड़ी कर देते हैं। नीचे 20/25 दुकानें प्रसाद, घंटियों, खाने पीने की चीजों की हैं, यहाँ से नीचे का दृश्य बहुत सुंदर है।

2.गोलू देवता मंदिर , घोड़ाखाल का दृश्य -  फोटो सौजन्य से स्मृति लोहिया

 


3.गोलू देवता मंदिर , घोड़ाखाल का विडिओ -  सौजन्य से स्मृति लोहिया

मधुमती फिल्म का फिल्मांकन भवाली, घोडाखाल और आसपास का है, फिल्म की पूरी यूनिट मय दिलीप कुमार, वैजयंतीमाला यहाँ पर रहे थे और शूटिंग की थी ।

पप्पू ने उडपीवाला, भीमताल को छोड़कर नए रेस्टोरेंट मे दक्षिणी खाना खिलाने का भरोसा दिलाया । भवाली तिराहे से जब आप रामगढ़ रोड़ पर चलेंगे तो वहाँ आपको कई रेस्टोरेंट मिल जाएंगे, उन्हीं में से एक नए रेस्टोरेंट में हमने डोसा खाया। फ्लैट की सफाई सोसाइटी के साथियों से पहले ही करवा ली गई थी । गाज़ियाबाद और भवाली के मौसम में बहुत अंतर था, शाम को काफी ठण्ड लग रही थी, कंबल ओढ़कर कुछ देर आराम करना उचित लगा । रास्ते में दूध, आलू,मटर, अदरक और अन्य सामग्री कम मात्रा में ले ली थी । सुभाष को बुलाकर गीजर, हीटर, गैस सब सामानों को चालू कराया गया । RO में कुछ तकनीकी समस्या के चलते सुभाष ने पाँच लीटर पानी लाकर दे दिया । विश्राम के बाद हमने चाय पी जिसमें अदरक की खुशबू अलग थी और जायका भी अलग था, साथ में घर की मठरियाँ और आम का हींग वाला अचार । इस चाय ने जलवायु और माहौल के अंतर का एहसास करा दिया । पीली चमेली के फूलों ने पीछे का बरामदा लाजवाब कर रखा था (फोटो नीचे देखें) ।

 
4. पीछे बरामदे की पीली चमेली , पाइन ओक सोसाइटी , भवाली

जंगल से लगी हुई इस सोसाइटी की आबोहवा और चीड़ के पेड़ों की महक अनोखी और रूह को शांति देने वाली है । यहाँ आने के बाद टी वी चलाने का कोई मन नहीं करता है। रात्रि भोज में बनाई गई साधारण आलू मटर की सब्जी लाजवाब एहसास करा रही थी । दिन भर की थकान और सर्दी ने हमें जल्दी रात्रि विश्राम के लिए विवश कर दिया ।

07.03.2026

अगले दिन की भोर एकदम अलग थी । वातावरण में सम्मोहित कर देने वाली अजब महक, नैसर्गिक गंध थी, मन कर रहा था कि सारी वायु सीने में भर कर दिल्ली वाली सारी प्रदूषित हवा शरीर से बाहर कर दी जाए । पंछियों की पौ फटने से पहले सुबह-सुबह की चरचराहट, भोर में जगाने का मीठा संदेश एक दिलकश आनंद की अनुभूति दे रहा था।

 


5. सोसाइटी से लगे जंगल का भोर का वीडियो

पक्षियों के साथ का आकर्षण शायद बचपन से ही है जब सुजानगढ़ में सुबह घर की बाखल में कबूतरों को दाना डालते थे और वहाँ मोर, गोरैया, कमेढ़ी सभी आ जाते थे । यहाँ, पक्षियों की सुबह-सुबह की उछलकूद, आनंद से एक पेड़ से दूसरे पेड़ और फिर खुले गगन में बेरोकटोक स्वछन्द विचरण, बेधड़क सैर और चंचल उड़ान विशेष तौर पर गौरैया, बुलबुल, ब्लू थरस, कोयल, लगता है यह इनका सुबह का योगा है या हम मनुष्यों को सीख कि जिंदादिली, बेधड़की से केवल आज और इस पल को कैसे जिया जाए। इन सबसे शुरुआत करके ही ये भोजन के लिए आती हैं। बड़े भाई ने बाउन्ड्री की दीवार पर लगी हुई लोहे की रेलिंग पर इनके खाने-पीने के मिट्टी के बर्तन लगवा दिए हैं, सुबह उठकर इनके भोजन एवं पीने के पानी की व्यवस्था कर दी गई। अपनी सुबह की दिनचर्या/ मौजमस्ती पूरी करने के बाद इन पक्षियों ने भोजन का निमंत्रण स्वीकार किया । बुलबुल जहां बर्तन में खाना पसंद कर रही थी, वहीं गौरेया खुले में और फर्श पर खाना पसंद कर रही थी । इन पक्षियों का आना-जाना फ्लैट के कमरे की शीशे की खिड़की से भी साफ नजर आ रहा था और आनंदित कर रहा था (फोटो नीचे देखें)।

 


6. पक्षियों का कलरव – विडिओ

ऐसे में विश्वमोहन तिवारी जी की किताब “आनंद पक्षी निहारन का” (फोटो नीचे देखे) का निम्न अंश जहन में याद आ जाता है,

“ मुझे लगता है कि वन प्रांतर, वन्य प्राणियों,पक्षियों, नदी के कलकल प्रवाहों से हमें जो प्रेम है जिसे हम तर्क से समझा नहीं सकते, क्योंकि वह सब-पूरा प्राकृतिक जीवन – हमारे सामूहिक अवचेतन में समाया हुआ है। आखिर हमारा उनका साथ लाखों वर्ष पुराना है, सहज है। इस सहज अनुभूति का आनंद उसी को मिल सकता है जो अपने हृदय की आवाज सुनकर, मशीनी जिंदगी के सतही आकर्षण को छोड़कर, प्रकृति के बीच जाकर नदियों की कलकल, पंछियों के गान, नृत्य, उड़ान आदि की अनुभूति करेगा । हमने प्रकृति के साथ, पंछियों के साथ जो लाखों वर्ष, इस विशाल विराट अंतरिक्ष में, छोटे-से नीले अंतरिक्ष यान में बिताए हैं वे ही तो सहज आनंद के स्रोत हैं, हम उन्हें सूखने न दें, वरन उस प्रेम को हमें पंछियों से, प्रकृति से मिलते रहकर बढ़ाना चाहिए । “

7.विश्वमोहन तिवारी जी की किताब “आनंद पक्षी निहारन का”

फ्लैट की चारदीवारी और सोसाइटी की बॉउन्ड्री वाल के बीच लगभग चार पाँच फुट का गलियारा है, वॉल के दूसरी तरफ पहाड़ है जहां चीड़, देवदार आदि के पेड़ और झाड़ियाँ हैं यानि जंगल/ प्रकृति और बिल्डिंग के बीच यहीं गलियारा है और शायद बस यही हमारी जिंदगी का फासला है, कभी-कभी इन्हीं फ़ासलों को पार करके जाने की जरूरत होती है ताकि जिंदगी को जिंदादिली, बेधड़की, बेबाक, बेखौफ, शांति, सुकून और नैसर्गिक तरीके से  जिया जा सके ।

बीती शाम यह पता चला था कि भवाली से कैंची धाम के लिए शटल सेवा चलती है । अतः सुबह घर से भवाली बस अड्डे के लिए पैदल निकल पड़े जो कि सोसाइटी से लगभग 1 किलोमीटर है । भवाली के मेन तिराहे पर आकर पता चला कि यहाँ पर आजकल कैंची धाम के लिए सीधे परिवहन सेवा नहीं है हालांकि पिथौरागढ़ की बसें कैंची धाम होते हुए जाती हैं । कैंची धाम नीचे नदी के किनारे है अतः यह सोचा कि ढलान पर लगभग 10 किलोमीटर पैदल ही चला जाए । सफर बहुत सुहावना था, आपके साथ साथ चलती हुई नदी , परंतु सड़क छोटी है जिस पर दो वाहन ही चल सकते हैं और पैदल यात्रियों के लिए कोई अलग से रास्ता नहीं है। अतः कुछ समय बाद वाहनों की द्रुत गति के मद्देनजर किसी सवारी की प्रतीक्षा की गई, अंततः एक पिक अप वाहन में लिफ्ट मिल गई और हम दोनों ड्राइवर के साथ वाली सीट पर चढ़कर बैठ गये । ड्राइवर ने बताया कि वह हल्द्वानी से धारचूला सब्जी और फल लेकर जाता है। उसने हमें मंदिर के दरवाजे पर छोड़ दिया और हमने उसे धन्यवाद के साथ 100 रुपये दे दिए । (फोटो नीचे देखें )

8.कैंची धाम की ट्रेकिंग – भवाली से

नीम करौली बाबा का मंदिर अब किसी से भी छुपा नहीं है। भक्तों की लगातार अविरल धारा बहती रहती है और चलती रहती है। हमें भी आराम से बाबा के दर्शन हो गए । यह मंदिर शिप्रा नदी के किनारे है और सड़क एवं मंदिर के बीच जाती हुई नदी पर छोटा सा पुल मार्ग है । यह नदी भवाली के श्यामखेत में से निकलती है और उलटी यानि दक्षिण से उत्तर की तरफ बहती है।

9.कैंची धाम दर्शन 

पिछले कुछ समय से इस मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है । वापसी में भी सवारी बमुश्किल मिल रही थी, अंत में उसी तरह की पिक अप वैन में हम दोनों को लिफ्ट लेनी पड़ी। रास्ते में हमने उससे पूछा कि क्या आप सेनेटोरियम की तरफ से जाएंगे। उसने कहा कि आप बैठे रहिए मैं आपको वहीं छोड़ दूंगा । भवाली के मेन तिराहे के बाद अगर आप काठगोदाम की दिशा में चलते हों तो कुछ ही दूरी पर सेनेटोरियम पड़ता है। इस बार हमने सेनेटोरियम पर स्थापना का पत्थर लगा हुआ देखा तो पता चला कि इसकी स्थापना 1912 में हुई थी । लगभग 114 साल पहले, यानि एक शताब्दी पूर्व। जिंदगी के कैसे कैसे रूप, कैसे कैसे जज़्बात, अंग्रेजों की गुलामी, स्वतंत्रता संग्राम के लिए बुना गया ताना बाना, आजाद भारत, आज की आधुनिक टेक्नॉलाजी, कच्ची सड़कें और घोड़ों का सफर, इन सभी का गवाह है यह सेनेटोरियम , जो सड़क से थोड़ी चढ़ाई चढ़ के है । यहाँ पर चीड़ के जंगलों के बीच बने इस सेनेटोरियम में सुभाष चंद्र बोस, कमला नेहरू, डॉ यशपाल, के एल सहगल आदि कितने ही लोगों ने स्वास्थ्य लाभ किया (फोटो नीचे देखें)। चीड़ की शुद्ध हवा इस बीमारी के इलाज के लिए हितकारी है । एलोपेथिक दवाओं के साथ प्राकृतिक तरीके से टी बी का इलाज करने वाला यह एशिया का सबसे बड़ा सेनेटोरियम है।

10.कमला नेहरू जी का कॉटेज – भवाली सेनेटोरियम में

लेकिन उस अतीत, उन यादों की गवाही किससे लें अब तो सब कुछ बदल गया है या यूं कहें कि सब छोड़कर चले गए हैं । मुझे लगा कि एक सजीव चीज है जो आज भी उस एहसास को अपने भीतर समेटे हुये है  – जी, चीड़ के लंबे बड़े पुराने दरखत – मूक गवाह – जिनसे गले मिलकर हमने एक अनुभूति, एक आभार, एक नमन  किया उनको जिन्होंने क्या कुछ नहीं सहा हमारे लिए, देश के लिए । सेनेटोरियम से लौटते हुये हमने काठगोदाम से आने वाली बस की सवारी ली और पाँच मिनट में भवाली तिराहे पर पहुँच गए ।

11. सेनेटोरियम से सड़क का अद्भुत नजारा

वहाँ से हम निकल पड़े डॉ यशोधर मठपाल जी की लोक संस्कृति संग्रहालय एवं कला दीर्घा देखने को जो भवाली से लगभग 6 किलोमीटर दूर भीमताल की तरफ जाते हुये, मचान रेस्टोरेंट (जिसका खाना बहुत स्वादिष्ट है) से पहले पड़ती है । यह एक व्यक्तिगत संग्रहालय है जो उनकी मेहनत और परिश्रम का नतीजा और खजाना है । साथ ही में उनका निवास स्थान अलग है।डॉ यशोधर मठपाल जी पद्मश्री से सम्मानित पुरातत्वविद और चित्रकार हैं, संग्रहालय में उनकी गुफा पेंटिंग, दूसरी पेंटिंग, पुराने बर्तन, पारंपरिक परिधान, मूर्तियां, पांडुलिपियाँ, आदिमानव के जमाने से लेकर अलग-अलग काल की वस्तुएं, पुराने सिक्के, पुराने वाद्य यंत्र आदि खजाना भरा पड़ा है, निःसन्देह वो उत्तराखंड की शान और गौरव हैं। यशोधर जी की फाइन आर्ट पेंटिंग जो कि वाटर कलर बेस्ड है - की खूबसूरती बहुत सराहनीय, सुकून वाली और लाजवाब है, उसमें जान है, जीवन है, उनकी पेंटिंग में आपको पहाड़ों का सौन्दर्य बोलता हुआ मिलेगा, कुछ पेंटिंग में पारंपरिक परिवेश, माहौल और जीवन शैली, कुछ स्पॉट पेंटिंग में गजब की जीवंतता, इतनी सजीव और बोलती हुई पेंटिंग दुर्लभ हैं, साथ ही हमें वहाँ उनसे और उनके पुत्र से मिलने का सौभाग्य मिला। इतनी बड़ी उम्र में भी वो पेंटिंग कर रहे है जानकर सुखद आश्चर्य हुआ । उनकी लिखी किताबों का संग्रह भी पास में रीसेप्शन पर उपलब्ध है। हमने भी एक किताब ली जिसे उन्होंने हस्ताक्षर सहित हमें दिया और कुछ उनकी पेंटिंग के पोस्टकार्ड। (फोटो नीचे देखें)। एक महान चित्रकार ने अपनी धरोहर और विरासत को सँजोकर रखने का बीड़ा उठा रखा है जो कि समाज को एक संदेश या आह्वान है।

12.पेंटिंग पोस्टकार्ड यशोधर मठपाल जी की पेंटिंग का  – लोक कला संस्कृति संग्रहालय में

13.लोक संस्कृति संग्रहालय का प्रवेश द्वार – फोटो सौजन्य से सुरेश मठपाल जी

14.यशोधर मठपाल जी की जीवंत पेंटिंग का पोस्टकार्ड - पेंटिंग संग्रहालय में  

वापस हम कुछ घरेलू सामान लेते हुये आ गए । सोसाइटी बहुत खुले में है और पार्क आदि की व्यवस्था बैठने, घूमने के लिए है । शुद्ध हवा, पानी के साथ खाना न केवल स्वाद में जायकेदार है बल्कि सेहत के लिए भी अच्छा है ।

15. फ्लैट का पीछे का बरामदा - जंगल का एहसास 

08.03.2026

अगले दिन पुनः हमने तय किया कि नैनीताल, जो कि लगभग 9-10 किलोमीटर होगा, का भ्रमण भी सार्वजनिक वाहन से किया जाए । हम पुनः भवाली के तिराहे पर आ गए जहां एक तरफ जीप (बलेरो/ टाटा सूमो) लगी हुई थी नैनीताल के लिए जिसका किराया 50 रुपये प्रति सवारी था । लगभग 10/15 मिनट में उसने हमें नैनीताल बस अड्डे पर उतार दिया । जहां से एक गली से निकल कर हम माल रोड के स्टार्टिंग पॉइंट या यूं कहें नक्की झील के शुरू पर निकल आए जिसे तल्लीताल भी कहते हैं । समय काफी था तो हमने यहाँ से पैदल भ्रमण शुरू किया। बोट / नाव वाले आपको जगह-जगह बुलाते हुये मिल जाएंगे । थोड़ी दूर मल्लीताल की तरफ चलते हुये, माल रोड पर ही हमने नैनीताल जू जाने के लिए पता किया तो एक काउन्टर मिल गया जहां से वो गाड़ी में बिठाकर आपको ऊपर जू पर छोड़ देंगे। वहाँ पहुंचकर हमने नीचे का नैनीताल का नजारा देखा तो बादलों की आगोश में नैनीताल बहुत खूबसूरत लग रहा था (फोटो नीचे देखें)।

 
16 .जू से नैनीताल का नजारा 

हमने प्रवेश के लिए टिकट लिया और चल पड़े जू घूमने । यहाँ पर मैं कई साल पहले भी आया था जब का मुझे व्हाइट टाइगर याद था । अंदर आपको तरह तरह के जानवर – हिरण, शेर, बाघ, साही, फिसेन्ट, पैरट, बहुत कुछ देखने को मिल जाएंगे । जू की आबोहवा, वहाँ का जंगल, ऊंचा नीचा रास्ता, शानदार हरियाली इसको अन्य जू से एकदम अलग पहचान देते है । अंदर एक बहुत छोटा और प्राचीन मंदिर भी है जो बहुत शांत है, आपको अच्छा लगेगा। निकलते समय आपको वहाँ खाने का स्थानीय रेस्टोरेंट और खरीदारी के लिए दुकान भी मिल जाएगी ।

मुझे याद आया जब मैँ अपनी बिटिया के साथ आया तो हमने माल रोड पर एक पहाड़ी जाएकेदार थाली पहाड़ी रेस्टोरेंट में खाई थी  जिसमें पहले बुरांश का वेलकम ड्रिंक दिया गया था और उसके बाद कुलथी की दाल, मँड़ुए की रोटी, खीर, आदि (फोटो नीचे देखे)। परंतु चहलकदमी में वो रेस्टोरेंट निकल गया।

17 . पहाड़ी खाने की थाली , माल रोड पर 

हमें लगा कि इस बार भी पहाड़ी थाली वाला खाना खाया जाए, पूछकर पता चला कि आप मल्लिताल चले जाएँ वहाँ अनुपम और शिवा रेस्टोरेंट है हमने शिवा रेस्टोरेंट में पहाड़ी थाली वाला खाना खाया। जिसके लिए हमने माल रोड से बाइक वाले को कर लिया जो एक एक करके हमें छोड़ आया और उसने पचास रुपये प्रति सवारी किराया लिया।

18 .शिवा रेस्टोरेंट में पहाड़ी खाने की थाली

मल्लीताल पर शॉपिंग के लिए अच्छी खासी मार्केट है। खाना खाकर हम पैदल ही निकल पड़े और कुछ सीढ़ियाँ उतर कर दाहिनी तरफ झील की तरफ चलेंगे तो वहाँ आपको न्यू कैपिटल पिक्चर हाल और द पहाड़ी स्टोर भी मिल जाएगा जहां से आप नैनीताल के यादगार लकड़ी, मोम आदि के सामान ले सकते है। उससे थोड़ी दूरी पर प्रसिद्ध नैनी मंदिर है । झील के किनारे किनारे चलने का जो लुत्फ है उसे आप घुमक्कड़ी कहेंगे या आवारागर्दी, पता नहीं लेकिन हाँ यह किसी उम्र की मोहताज नहीं हैं अतः इसको कभी भी ना छोड़ें।

नैनीताल का माल रोड शाम को 6 बजे से 9 बजे तक वन वे कर दिया जाता है ताकि पर्यटक झील के किनारे ठंडी ठंडी हवा में पैदल आसानी से घूमकर लुत्फ ले सकें।

19 .नैनीताल का माल रोड

पूरी माल रोड पैदल घूमते घामते, हमने तल्लीताल आकर और बस स्टेंड पहुंचकर भवाली की जीप ले ली, दस मिनट का जीप से भवाली तक का घुमावदार सफर भी काफी दर्शनीय एवं सुहाना है।

09.03.2026

आज हमारी वापसी थी अतः वातावरण में नमी की वजह से सारे बर्तनों को धोकर, सुखाकर पैक करना था, एंटी मॉइस्चर के पाउच रखने थे, बिस्तर आदि को कवर करना था, खाने का सामान समेटना था क्योंकि दोपहर 3.15 बजे काठगोदाम से दिल्ली की शताब्दी ट्रेन से वापसी थी । दोपहर के खाने के लिए बाहर खाना ही मुनासिब लगा। पप्पू ने अपने भाई को टैक्सी लेकर भेज दिया था जो लगभग 12 बजे सोसाइटी में घर के बाहर आ गया था । पहाड़ के सफर में रास्ते की दूरी के लिए समय का मार्जिन लेना जरूरी है । रास्ते में नीचे उतरते हुये काठगोदाम रेल्वे स्टेशन से लगभग 1 किलोमीटर पहले हमने उड़पी रेस्टोरेंट ,काठगोदाम पर गाड़ी रुकवा ली । रेस्टोरेंट में अंदर कई बार बहुत भीड़ होती है लेकिन हमें जाते ही जगह मिल गई। हमने डोसा, इडली ऑर्डर कर दिया, इतना पारंपरिक (authentic) और स्वादिष्ट दक्षिणी खाना आपको दूर दूर तक नहीं मिलेगा, एक बार आप अवश्य जाएँ। काठगोदाम का रेल्वे स्टेशन साफ-सुथरा और थोड़ी भीड़ वाला है। घर पर रहने के साथ साथ घूमने का मजा लेकर हम अपने घर वापसी के लिए चल दिए।


चलिए दोस्तो, आपको फिर ले चलूँगा बचपन, जवानी की कुछ जानी-पहचानी, कुछ अनजानी, कुछ सुनसान गलियों में , मोहल्लों में, एक नए शहर, नए देहात, नए कस्बे, नए गाँव, नए पर्यटन स्थल के साथ ।

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तब तक के लिए अलविदा, अभिवादन । 

Tuesday, August 11, 2026

अमृतसर से अटारी बॉर्डर (TRAVEL MEMOIR - AMRITSAR TO ATTARI BORDER)

अमृतसर से अटारी बॉर्डर  (TRAVEL MEMOIR -  AMRITSAR  TO ATTARI BORDER) 


4 जून 2026

अमृतसर घूमने की इच्छा से हमने सुबह छह बजे बिना नाश्ता किए ही डलहौजी को अलविदा कह दिया। बनीखेत पार करके रास्ते में एक खुले और बड़े ढाबे में चाय नाश्ता किया। हिमाचल के इस रास्ते में CNG मिलने में थोड़ी परेशानी हुई। अमृतसर में रोजाना लाखों पर्यटक दर्शन और घूमने के लिए आते हैं, अतः गोल्डन टेम्पल की विशालकाय कार पार्किंग है। ड्राइवर ने गाड़ी पार्किंग में लगा दी, वहीं एजेंट ने हमें अच्छा होटल एक दिन के लिए दिलवाने की बात कर ली और हमारे साथ हो लिया। हमने कहा कि होटल गोल्डन टेम्पल के पास होना चाहिए। मेरे दोस्त ने मुझे एसजीपीसी की सारा गढ़ी सराय में कमरा बुक करने के लिए बोला था क्योंकि उनकी व्यवस्था बहुत अच्छी है  लेकिन हमारा कार्यक्रम दो दिन पहले ही बना था, तो बुकिंग नहीं मिली। एजेंट हमें पुरानी लक्कड़ मण्डी वाली गली में ले आया और वहाँ हम जी सी ग्रांड इन होटल में रुके, जो कि जलियाँवाला बाग और गोल्डन टेम्पल से पैदल दूरी पर एक छोटा और साफ सुथरा होटल है।

ना केवल लक्कड़ मंडी वाली गली बल्कि पूरा अमृतसर एक ऐतिहासिक शहर है। यह भारत का वो शहर है जिसने बंटवारे का सबसे बड़ा दंश या त्रासदी बहुत नजदीकी से और बहुत इंतहा के साथ सहा। लक्कड़ मंडी में अधिकतर लोगों ने अपने घर होटल में तब्दील कर दिए हैं और जब होटल से लगे हुए एक रिहायशी मकान के बुजुर्ग मालिक से बात हुई तो पता चला कि उनका परिवार यहाँ 100 साल पहले से रहता था। मतलब, परिवार ने आजादी की लड़ाई, बंटवारे की व्यथा, अंग्रेजों के जुल्म, सायरन की आवाजों के तले दबी खौफनाक रातें, अनिश्चितता के गर्भ में दबा भविष्य, सब कुछ देखा, महसूस किया, झेला था और जिसके जख्म आज भी कहीं हरे हैं। इतिहास खँगालने पर पता चलता है कि यह शहर भी कभी खुशमिजाज और मस्ती, जिंदादिली वाले माहौल का था। इस बात का पता आपको चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी “उसने कहा था” से चलता है जिसकी शुरुआत इक्के वाले (ताँगे वाले) की मिट्ठी पञ्जाबी जुबान से होती है—

“कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती, तो उनकी वचनावली के ये नमूने हैं—हट जा जीणे जोगिए; हट जा करमाँवालिए; हट जा पुत्तां प्यारिए; बच जा लंबी वालिए। समष्टि में इनके अर्थ हैं, कि तू जीने योग्य है, तू भाग्यों वाली है, पुत्रों को प्यारी है, लंबी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहिए के नीचे आना चाहती है?—बच जा।“

समय के साथ यह धरा दर्द भरे दौर से गुजरी है। परंतु आज न वो ताँगे वाले हैं और ना ही वो जुल्म करने वाले लोग। हाँ, कुछ गहरे निशान बाकी हैं। शहर वापस खुशमिजाज, जिंदादिल, भाईचारे वाले लोगों से भरा हुआ है। धरा वापस अपनी महक को ले आई है।

होटल के रीसेप्शन पर पूछताछ के बाद, 12 बजे के बाद हम पैदल ही जलियाँवाला बाग निकल गए जो कि काफी करीब था (फोटो नीचे देखे)। बाग में प्रवेश करने के बाद बाईं तरफ एक ऑडिटोरियम में फ़ोटोज़ भी लगे हैं और ऊपर एक डॉक्यूमेंट्री परदे पर दिखाई जाती है। उस समय के जुल्म, दर्द, होश उड़ाने वाले मंजर हैं। दीवारों पर आज भी गोलियों के निशान आपको मिल जाएंगे। सरकार ने इसका स्वरूप रखरखाव के हिसाब से संवार दिया है। बाग के बाहर पापड़, अमृतसर बड़ियाँ, छोले कुलचे, जूतियों, कपड़ों आदि की दुकानें हैं।

                          जलियाँवाला बाग , अमृतसर 

मेरे एक साथी यहाँ बैंक में कार्यरत हैं। उनसे रास्ते में ही हमने पूछ लिया था कि छोले कुलचे कौन-सी दुकान के मशहूर है। समय को ध्यान में रखते हुए और यह जानते हुए कि अटारी बॉर्डर के लिए लगभग 3 से 4 बजे के बीच निकलना होगा, एक रिक्शा वाले से बात की और हम चल पड़े केशर दा ढाबा के लिए।रास्ते में पार्टिशन म्यूज़ीयम और उसके सामने ब्रदर्स ढाबा और ब्रा दा ढाबा, दोनों अमृतसर की बेहद मशहूर जगह हैं, लेकिन समय की कमी की वजह से वहाँ जाना ना हो सका। केशर दा ढाबा अपने साफ-सुथरे वातावरण और लजीज खाने के लिए मशहूर है।

                          केशर दा ढाबा , अमृतसर 

हमने वहाँ से पूछकर पहलवान दा ढाबा वाले के छोले कुलचे के लिए ले जाने के लिए रिक्शा वाले को बोल दिया, लेकिन उसने आर्शी कुल्चा कॉर्नर, घी मण्डी चौक, ले जाकर रिक्शा रोक दिया। बाहर से देखकर लगा कि उसने कहाँ लाकर रोक दिया है। दुकान के मालिक से भी बात की। उसने कहा कि आप एक बार खाकर देख लीजिए, फिर बताना। हम बड़े अनमने मन से अंदर चले गए। उसने गरम-गरम छोले कुलचे और लस्सी दी। क्या स्वाद था; खाकर बहुत अच्छा लगा। आप जब भी यात्रा पर निकलें तो स्थानीय व्यंजनों का लुत्फ अवश्य लें और अमृतसर तो विशेष तौर पर अपने जायकेदार खाने के लिए मशहूर हैं।

                         आरशी कुल्चा कॉर्नर, अमृतसर 

उसके बाद हमने रिक्शा वाले को कपड़ा मार्केट चलने के लिए बोल दिया। उसने 15 मिनट बाद एक बड़ी से दुकान के बाहर ले जाकर रिक्शा खड़ी कर दी। हम विश्वास करके अंदर चले गए, लेकिन कोई खास बात नहीं रही, फिर भी याद के लिए कुछ सूट ले लिए। वास्तव में हम अमृतसर के असली कपड़ा मार्केट नहीं पहुँच पाए। 

वापस होटल में आकर, हमारे दिल्ली के एक साथी जो वहाँ पोस्ट थे, उनसे मुलाकात की और बहुत अच्छा लगा। पुराना साथ बिताया हुआ समय फिर याद किया। उनके जाने के बाद हमने ड्राइवर को फोन करके कहा कि गाड़ी निकाल ले ताकि अटारी बॉर्डर जा सकें क्योंकि लगभग चार बजने वाले थे और लग रहा था कि इतनी गर्मी में परेड देखने के लिए खुले में कैसे बैठेंगे। खैर, पार्किंग में ही जाना पड़ा, गाड़ी से चलने के लिए। रास्ते में अचानक आँधी, तूफान और बारिश आ गई। मौसम खुशगवार हो गया था। लगभग पाँच बजे हम वहाँ पहुँच गए और गाड़ी पार्किंग में लगा दी। समय और दूरी (लगभग 500 मीटर) को देखते हुए, वहाँ से रिक्शा करनी पड़ी, पहुँचकर हम प्रवेश के लिए लाइन में लग गए। औरतों और मर्दों की अलग-अलग लाइन थी। लेकिन अंदर प्रवेश से पहले आप एक साथ हो जाते हैं। बहुत बड़ा दरवाजा और बिल्डिंग है (नीचे फोटो देखें)।


                           अटारी बॉर्डर , अमृतसर            

आप घुसने से पहले देखेंगे कि बिल्डिंग के दोनों तरफ आपको हरे-भरे खेत और एक लोहे के तारों की बाड़ दिखाई देगी। यही बटवारे की निशानदेही है जिसे हम इंसानों ने खींच दिया।परिंदे आज भी इस खेत से उस खेत बेखौफ जा रहे हैं, हवाएँ आज भी अपनी ठंडक और सुकून बिना किसी जात, धरम, देश के सबको खुशियाँ दे रही हैं, तितलियाँ आज भी सीमाओं के बंधन से परे घूम रही हैं। यहाँ से लाहौर केवल 22 किलोमीटर दूर है, लेकिन इन दीवारों के बाद, इन सीमाओं के बाद, लगता है कि कितना दूर है। यह जगह आप रुककर देखेंगे, तो आपको एक अलग एहसास और जज्बा देगी। हाल ही में इम्तियाज़ अली की फिल्म “मैं वापस आऊँगा” देखी थी जिसने विभाजन के मुद्दे को बड़े संजीदा तरीके से छुआ था।लेकिन कितना मुश्किल है वापस जाना, वापस रहना, उन गलियों में, उन शहरों में जो सीमाओं और जात-पात के बंधनों में बंध गए हैं और जिन्हें इतिहास ने जुल्म और सितम के रंगों से रंग दिया है। उम्र के इस पायदान पर अपनी मातृभूमि, अपने शहर, अपने दोस्तों, अपने परिवार और करीबी का खिंचाव लाजमी है।

अंदर जाकर काफी ऊपर सीढ़ियाँ चढ़कर परेड देखने के लिए जगह मिली। हमारी तरफ हमारे सैनिक अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं और दूसरी तरफ पाकिस्तान के सैनिक। हमारा ओपन ऑडिटोरियम खचाखच भरा था। सैनिकों का प्रदर्शन देशभक्ति का जज्बा भर देते हैं और आपकी आँखों में गर्मजोशी ,हिम्मत, गर्व, समा जाती हैं , जिसके लिए हमारे सीमा प्रहरी - बी एस एफ का धन्यवाद । इस परेड को देखना अनोखा रोमांचक है। वन्दे मातरम।

 


  अटारी बॉर्डर का वीडियो

वापस होटल तक लौटते हुए हमें आठ बज गए। हम फ्रेश होकर गोल्डन टेम्पल के लिए निकल गए, जो होटल से लगभग 10 मिनट की पैदल दूरी पर था। प्रवेश करते ही विशाल प्रांगण, आस्था का सैलाब और उसकी बहुत सुंदर संचालन व्यवस्था। अंदर बाईं तरफ जूते रखने का स्थान है, उसके बाद विशाल सरोवर है जिसमें स्त्री और पुरुषों के नहाने की अलग-अलग व्यवस्था है। पुरुष लोग खुले में भी नहा रहे थे। मैंने डुबकी लगाकर स्नान किया। उसके बाद अमृत पानी पिया और हम चल दिए लंगर में प्रसाद खाने के लिए, जहाँ हजारों लोगों को एक साथ खाना खिलाया जा रहा था। लंगर दिन-रात चलता रहता है। दाल, रोटी, सब्जी, खीर के साथ बहुत स्वादिष्ट प्रसाद। तत्पश्चात दर्शन, ध्यान और मनन, आस्था और श्रद्धा के सैलाब की व्यवस्थित परिक्रमा। इतनी भारी भीड़ के बावजूद एक अलग शांति का एहसास। यही निराकार शक्ति का वजूद है। दान राशि के लिए आप रसीद कटवा सकते हैं। अन्त में हमने घर के लिए प्रसाद लिया और होटल के लिए प्रस्थान किया। होटल की नज़दीकी यात्रा को सुगम बना रही थी।

 
                      गोल्डन टेम्पल , अमृतसर 
यात्रा बहुत ज्यादा भागमभाग वाली थी लेकिन तब भी बहुत रोचक थी और हमें लगा कि अमृतसर की गलियों को और खंगालना हो, छोले कुलचे की भिन्न-भिन्न किस्मों का स्वाद चखना हो, गोल्डन टेम्पल में और अच्छे से दर्शन करने हो, पार्टिशन म्यूजियम देखना हो, लोगों के दर्द के एहसास को छूना हो, तो हमें सर्दियों में फिर वापस आना होगा।

05.06.2026

हम हिंदुस्तानियों को एक समय बाहर रहने के बाद अपने घर की याद सताने लगती है, अतः सुबह जल्दी ही होटल पर गाड़ी को बुला लिया था और हम निकल गए वतन वापसी के लिए। रास्ते में हमारे साथी के यहाँ हमने लुधियाना में आलू के पराँठों और चाय का नाश्ता किया और दोपहर का खाना पैक करवा लिया क्योंकि बाहर का खाना खाते हुए बहुत दिन हो गए थे। पुराने दोस्तों से यूँ ही मिलते रहे, तो मन तरोताजा हो जाता है। यह लुधियाना का वो नया एरिया है, जहाँ आपको लुधियाना की भीड़-भाड़ और शोरगुल का पता ही नहीं चलेगा।

 
रास्ते में खाना खाते हुए और बीच में चाय पीते हुए हम लौटे और लगभग आठ बजे अपने घर वसुंधरा आ गए।

चलिए दोस्तों, आपको फिर ले चलूँगा बचपन, जवानी की कुछ  जानी-पहचानी, कुछ अनजानी, कुछ सुनसान गलियों में, मोहल्लों में, एक नए शहर, नए देहात, नए कस्बे, नए गाँव, नए पर्यटन स्थल के साथ।

तब तक के लिए अलविदा, अभिवादन।  

 


 

 




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