Tuesday, July 28, 2026

डलहौजी का सुभाष चौक (Travel Memoir of Dalhousie, khajjiar, Dainkund and Taleru)

 

 

डलहौजी का सुभाष चौक  (Travel Memoir of Dalhousie, khajjiar, Dainkund and Taleru)

 

बैंकों  में हॉलिडे होम की सुविधा मिल जाती थी अतः बहुत सारे कार्यक्रम / भ्रमण / पर्यटन इसी बहाने बन जाते थे । डलहौजी जाने का कार्यक्रम कई मर्तबा बना परंतु संभव नहीं हो पाया । इस बार भी ३१ मई से चार दिन के लिए हॉलिडे होम फिर बुक करा दिया । दिल्ली से डलहौजी आप बस के द्वारा भी जा सकते हैं  – रोडवेज और वॉल्वो बस , जिसके लिए आप रात्रि यात्रा भी कर सकते हैं । दूसरा, दिल्ली से पठानकोट तक की यात्रा ट्रेन से भी की जा सकती हैं  जोकि डलहौजी के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन है, उसके बाद टेक्सी ली जा सकती है । तीसरा,  दिल्ली से धर्मशाला (निकटतम एयरपोर्ट ) हवाई यात्रा करके भी आप डलहौजी पहुंच सकते हैं । गाज़ियाबाद से डलहौजी की दूरी काफी ज्यादा हैं परंतु लगा कि अपनी गाड़ी ही लेकर चलते हैं सुविधा रहेगी जो CNG की है ।

हापुड़ के एक ड्राइवर से बात की गई और चूंकि हम सुबह जल्दी निकलना चाहते थे क्योंकि यात्रा के लिए १२ घंटे के सफर का एक अंदाजा हम सोच रहे थे अतः हमने उसे सुबह लगभग ६ बजे निकलने की इच्छा व्यक्त की । उसने कहा , “मैं आपको डासना मिल जाऊंगा वहाँ से पेरिफेरल एक्सप्रेस वे पर चढ़कर सोनीपत होते हुये पठानकोट के लिए निकल जाएंगे “। हमने उसे हामी भर दी ।

यात्रा के ४/५ दिनों को ध्यान में रखते हुये पैकिंग शुरू कर दी गई । सबसे पहले पहाड़ों के मौसम को ध्यान में रखते हुये गरम कपड़े और स्वेटर, शाल, छतरी रखी गई, फिर कुछ दवाइयाँ जैसे पेट दर्द, सिर दर्द, वॉलीनी, विक्स आदि रख ली गईं ।

1 जून 2026 को हमने सुबह छह बजे गाड़ी से वसुंधरा से डासना के लिए प्रस्थान किया। वहाँ ड्राइवर ने गाड़ी संभाल ली और उसने  पेरिफरल पर गाड़ी चढ़ाकर सोनीपत की दिशा में  बढ़ा दी । सुबह का नाश्ता मुरथल में मन्नत ढाबे पर किया गया । उसके बाद अंबाला और लुधियाना का रास्ता था, लुधियाना के बाद लंच के लिए गाड़ी रोकी, उसके बाद पठानकोट में लगा कि सफर ज्यादा हो गया है तो एक छोटा सा ब्रेक लेकर जूस, चाय आदि ले लिया जाए । उसके बाद थोड़ी चढ़ाई शुरू होती है और चूंकि चार बज गए थे अतः लग रहा था कि डलहौजी अंधेरे से पहले पहुँच जाएँ , क्योंकि ड्राइवर भी पहले कभी डलहौजी नहीं गया हुआ था । इस सफर का जो मेरा सबसे मनपसंद हमसफ़र था वो बिटिया का दिया हुआ सारेगामा का कारवां (गानों का रिकॉर्डर) – उसके पुराने सुरीले गीतों ने सफर का रोमांच बहुत बढ़ा दिया और रास्ता छोटा कर दिया ।

हम लगभग शाम सात बजे डलहौजी, सुभाष चौक पहुँच गए वहाँ से बाईं तरफ गली , जोकि वन वे है (लेकिन सड़क पर काम की वजह से अभी आना जाना दोनों एक ही तरफ से हो रहा था ) से होते हुये हम अपने होटल रावी व्यू पहुँच गए । होटल के पीछे की तरफ खुला एरिया है जहां टेबल कुर्सियाँ रखी हैं और वहाँ का व्यू बहुत प्यारा है ।

 

1. होटल रावी व्यू डलहौजी से सूर्यास्त का नजारा 


होटल से हम थोड़ा टहलने निकल गए , सुभाष चौक हमारे होटल की दूसरी दिशा से लगभग मुश्किल से ४०० मीटर था , वहाँ अच्छी रौनक थी , कोने पर एक चाय वाले के पास खुले में   बैठकर घर के पराँठों और आलू की सब्जी के साथ चाय पी , अदरक की देशी पकी हुई चाय पीकर बड़ा अच्छा लगा और थकान उतर गई , हालांकि सामने की तरफ पंजाबी रेस्टोरेंट में  दूसरी चाय भी उपलब्ध है, उसने बताया कि वह सुबह ६.३० अपने गाँव से पैदल चल कर आता है । वापिस आकर हम विश्राम के लिए चले गए । होटल के रीसेप्शन पर लगे फोटो से अगले दिन की रूपरेखा बनाई ।

क्योंकि खजिहार जाना है यह तो निश्चित था पर उसके आगे का नहीं पता था , वहाँ पर बैठे  लोगों  से बातचीत कर सुबह का प्लान बन गया। 


2. होटल रीसेप्शन से फोटोसहित जानकारी 


3 . होटल रावी व्यू डलहौजी से सुबह का नजारा


2 जून 2026

सुबह उठ कर मैं  सुभाष चौक निकल गया , रात जो चौक भीड़ भाड़ से गुलजार था , सुबह एकदम खाली , कुछ लंगूर मस्ती कर रहे थे और स्थानीय निवासी सुबह की मॉर्निंग वाक करते हुये एक दूसरे का अभिवादन कर रहे थे । चाय वाला अभी नहीं आया था। सुभाष चौक साईकिल  के पहिये की तरह है साईकिल के पहिये की तीलियों की तरह , हर तरफ अलग अलग गलियां हैं । चाय का इरादा त्यागना पड़ा । वापिस होटल आ कर पीछे खुले एरिया से डलहौजी का नजारा बहुत खूबसूरत लग रहा था ।


सुबह ८ बजे के लगभग हम दोनों तैयार होकर पुनः सुभाष चौक नाश्ते की खोज में आ गए । हमें यात्रा में  सबसे पहले कच्चे खाने की तलाश होती है । चौक से दाहिनी तरफ उतरते ही सीधे हाथ पर एक मिठाई की दुकान है जिस पर सुबह के नाश्ते के नाम पर पराँठे , पूरी और चने की रेशेदार सब्जी थी और चाय थी । चूंकि हम सबसे पहले ग्राहक थे तो सब कुछ ताजा , साफ सुथरा मिल गया । आलू का परांठा एवं दही और पूरी चने की सब्जी, चाय के साथ खाकर मजा आ गया ।

4 .नाश्ते के लिए मिठाई की दुकान, सुभाष चौक , डलहौजी

सुभाष चौक से आप टैक्सी भी ले सकते हैं जोकि हर समय उपलब्ध हैं और अलग अलग दिशाओं और अलग अलग स्थानों के टूर कर सकते हैं ।

उसके बाद सुबह ही गाड़ी लेकर खज्जियार के लिए निकल गए जिसे भारत का मिनी स्विट्जरलेन्ड कहा जाता है । डलहौजी से खज्जियार का सफर जंगलो और वादियों में से निकलते हुये बहुत ही मनमोहक है, मदमस्त करती हुई हवायें , बड़े बड़े देवदार के पेड़, अपना मनपसंद सुरम्य संगीत , धूप छाँव की अठखेलियाँ , पक्षियों की चरचराहट, इन वादियों में खोने के लिए , अपने आप को छोड़ दीजिए । लगभग एक घंटे बाद हम खज्जियार पहुँच गए जहां अच्छी खासी चहल पहल थी । गाड़ी को पार्किंग में  लगाकर हम घूमने निकल गए, खज्जियार जो अपने घास के मैदान (meadow) , बीच में पानी का छोटा ताल (wetland), चारों तरफ देवदार के बड़े पेड़ों के लिए मशहूर है , इतरा कर कहता है कि यूं ही नहीं उसे मिनी स्विट्जरलेन्ड कहते हैं । इसकी खूबसूरती को शब्दों में बयां करना मुश्किल  है और इसे देखकर आपको कश्मीर के गुलमर्ग की याद आ जाएगी । यहाँ पर आप घुड़सवारी का आनंद ले सकते हैं, फोटोग्राफी का आनंद ले सकते हैं ,पैराग्लाइडिंग कर सकते हैं  , खाने के लिए हर तरह के रेस्तरां उपलब्ध हैं । हमने यहाँ पर चाय नाश्ते का आनंद लिया ।


 


5. खज्जियार का व्यू.  6. खज्जियार भोजन रेस्टोरेंट 7.खज्जियार का नजारा 8. खज्जियार का वेट लेंड 


 9. खज्जियार का विडिओ 


फिर हम कालाटॉप के लिए निकल गए जिसके लिए आपको वापिस लक्कड़मंडी के लिए आना पड़ता है  । यहाँ से कालाटॉप की  दूरी लगभग तीन किलोमीटर की है , रास्ता थोड़ा खराब है , जहां आप टेक्सी ले सकते हैं , पैदल जा सकते हैं  , अपनी गाड़ी से भी जा सकते हैं । हम यहाँ अपनी गाड़ी से ही गए थे, पर लग रहा था कि टेक्सी ले आते । कालाटॉप अपनी ओपन वन्यजीव अभयारण्य (wildlife sanctuary) के लिए प्रसिद्ध है । यहाँ फॉरेस्ट रेस्ट हाउस भी है (फोटो नीचे देखें ) और साथ में  कॉटेज भी है जिन्हें आप ठहरने के लिए किराये पर ले सकते हैं । यहाँ हमें एक बुजुर्ग गाइड मिले जिन्होंने बताया कि भालू कितना खतरनाक और जानलेवा होता है । उन्होंने यहाँ पर कई जंगली जानवर देखे हैं  । उतरने और चढ़ने के लिए रास्ते हैं , देवदार के पेड़ों के बीच यह शांत और खामोश वाक आपको जिंदगी भर याद रहेगी । सभी को भूख लग रही थी । यहीं पर एक तरफ स्थानीय लोग ताजा खाना बना रहे थे और साथ में  मेगी , पकोड़ी , समोसे, मोमोज आदि बन रहे थे , बैठने की व्यवस्था हेतु टेबल , कुर्सियाँ जहां उनकी रसोई थी वहाँ पर भी थी और सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर खुले में  भी थी । हमने दाल, चावल , राजमा , रोटी ऊपर बैठकर खाई आज भी उस सादे घरेलू खाने का स्वाद याद है । गेट पर एक दुकान स्थानीय सामानों की बिक्री के लिए भी है ।

10.कालाटॉप का फॉरेस्ट रेस्ट हाउस

11.कालाटॉप देवदार के पेड़ों के बीच

कालाटॉप से हम डेनकुंड पीक के लिए निकल गए , रास्ता घुमावदार और आँखों , दिल और मन को सुकून देने वाला,  वहाँ पहुँच कर लंबी गाड़ियों की कतार देख कर ड्राइवर को बोल दिया कि हमें छोड़कर और गाड़ी को वापिस मोड़कर आगे लगा दे । एक तरफ ऊपर डेनकुंड पीक / पोहलाणी माता का मंदिर है और दूसरी तरफ एयर फोर्स पुलिस स्टेशन का रास्ता है जो आम जनता के लिए बंद है ।

12.डैनकुंड की चढ़ाई शुरू करने का स्थान

चढ़ाई शुरू करते ही संशय हुआ कि  हम चढ़ पाएंगे या नहीं , श्रीमती जी को चढ़ने पर सांस फूलने लगता है और मुझे लोअर बैक में दर्द हो जाता है । शुरू मे ही डंडियाँ नाममात्र किराये पर देने वाले मिल जाते हैं अतः हमने दो डंडिया ले लीं ताकि सफर आसान रहे । रास्ते में बुजुर्ग लोगों को देखर हिम्मत बंध गई । सफर की कुछ चढ़ाई करने के बाद जो नजारा आपको मिलता है वो आपको भौंचक्का कर देगा , आप हैरान रह जाएंगे , छोटे छोटे जंगली फूलों से लदी हरिभरी खूबसूरत वादियाँ जैसे आसमान में तारों की बारात हो और उनके बीच से थोड़ा सा ऊंचा नीचा , घुमावदार रास्ता, नीला खामोश दूर तक फैला हुआ आकाश, असीम, अनंत, खामोश, पहाड़ों पर उड़ते हुये बादल जो आपको और जिन्हें आप छूने को बेताब, मंद मंद हवा में  आप, प्रकृति और उस अदृश्य शक्ति की नजदीकियाँ , हाँ खजिहार की खूबसूरती अलग है लेकिन इस ट्रेक पर चलकर जो आनंद, जो रोमांच, जो सुकून आपको मिलेगा उसको आप जिंदगी भर नहीं भूल पाएंगे, आपको लगेगा कि यह कौनसे गगन या जहान की खुली यात्रा है। शहरों में तो आकाश भी बिल्डिंगों के बीच कहीं खो गया है ।

13. डैनकुंड से नीचे का विहंगम दृश्य 



14. डैनकुंड की ट्रेकिंग 
15. डैनकुंड बादलों के बीच का व्यू 

ट्रेक और यात्रा का समापन पोहलाणी माता के मंदिर दर्शन पर होता है बिना छत का खुला मंदिर , जोकि माँ काली का ही स्वरूप है , शहरों में मंदिरों की बंद चार दीवारियों से निकलकर जब आप खुले में  ब्रह्म के सामने दो मिनट बैठेंगे तो कुछ अलौकिक होगा जो आपको छू कर जाएगा । तत्पश्चात,  लंगर में प्रसाद लिया और वहीं एक दुकान पर चाय पी और कुत्तों और कव्वों को बिस्किट खिलाए । लौटते में  शाम ढलने वाली हो रही थी , चरवाहे ( महिलायें भी ) अपनी बकरियों, भेड़ों, भैंसों को वापिस हांक रहे थे । इतनी ऊंची चढ़ाई उनकी रोजाना की आदत थी । नीचे उतरकर धन्यवाद के साथ डंडे वापिस कर , हम गाड़ी की तरफ आ गए , नीचे चाय, मेगी आदि के स्टॉल थे ।

16. पोहलाणी माता का मंदिर 

डलहौजी होटल में विश्राम कर हम गांधी चौक की तरफ निकल गए जोकि होटल से लगभग २ किलोमीटर के करीब होगा, डलहौजी अंग्रेजों के द्वारा बसाया हुआ शहर है यह जब आप होटल से गांधी चौक के लिए पैदल चलेंगे तो आपको पता चल जाएगा , जगह जगह किनारे पर लोहे के नक्काशी वाले शेड, उनके अंदर नक्काशी वाली बहुत पुरानी लोहे की लंबी आरामदायक कुर्सियाँ, पुराने जमाने के लोहे के लैम्प शैड, ताकि आप इनमें बैठकर पहाड़ों की शांति और उन नजारों को महसूस कर सकें । एक एहसास - ठहराव, थोड़ी थोड़ी दूरी पर ठहराव, फुरसत के लमहें । मुझे लगता है कि हिल स्टेशन को बसाने में जहां उनकी सड़कें , घर, होटल, बिजली अहम हैं उससे भी कहीं ज्यादा यह जगह जगह पर बनाए गए विश्राम स्पॉटस या ठहराव हैं । यह आज भी संदेश दे रहे हैं कि इस भागदौड़ और कशमकश भरी जिंदगी में अगर हम थोड़ी थोड़ी दूरी के बाद एक ठहराव/ विश्राम ले लें तो शायद जिंदगी आसान और ऊर्जा से भरी हुई हो जाएगी । गांधी चौक पर ही डलहौजी का माल रॉड है जो थोड़ा तंग है , जहां आपको  खरीदारी, खाने पीने का सामान मिल जाएगा । लौटते हुये गांधी चौक पर ही शुद्ध शाकाहारी शर्मा भोजनालय पर खाना खाया ।होटल आकार रीसेप्शन पर लगा फोटो देखकर अगले दिन की रूपरेखा बनाई ।

3 जून 2026

सुबह वापिस सुभाष चौक आकार अपने पसंदीदा शाकाहारी नाश्ते के लिए डलहौजी स्वीट्स पर आ गए , उसके ठीक सामने एक फल और सब्जी वाले की दुकान है । इस बार हम निकल गए तलेरू बोटिंग पॉइंट पर , रास्ते में पहले चमेरा बांध (डेम) आया , उसके बाद चमेरा झील आई , इसी झील पर तलेरू बोटिंग पॉइंट है । यहाँ कई छोटे छोटे स्टाल / दुकानें हैं जो स्थानीय निवासी चलाते हैं , हमने एक जगह फलों की चाट खाई । यह एक शांत , रमणीय जगह है जहां कई तरह की बोटिंग उपलब्ध है और जिनके रेट अलग अलग हैं । सामूहिक रूप में जाने पर ५०० रुपये प्रति सवारी है । हरे रंग का झील का पानी आपको बोटिंग में हरा भरा सुकून देगा ।


17. और 18. तलेरू बोटिंग पॉइंट स्वागत एण्ड स्टार्टिंग पॉइंट 

 

19.भलेई माता का मंदिर 

वहाँ से थोड़ी सी दूर लगभग ७ किलोमीटर भलेई माता का मंदिर है जो माँ भद्रकाली को समर्पित है , माँ भद्रकाली का मुख्य शक्ति पीठ कुरुक्षेत्र में है , थोड़ी सी सीढ़ियाँ चड़कर मंदिर का प्रांगण है , आप श्रद्धा से वहाँ पूजा अर्चना कर सकते हैं  ।

लौटते समय , झील के किनारे किनारे का खूबसूरत सफर, जैसे कह रही हो कि मुझे भी साथ ले चलो और आपका भी मन करेगा कि सफर के अन्त तक यह साथ ही रहे,  दूसरी तरफ झील के आस पास की बस्तियां जो कह रही हों ठहर जाओ, यहीं रुक जाओ , यही पशोपेश । हम चार बजे तक होटल आ गए ।

20.चमेरा झील का सफर – वापसी में  

विश्राम करने के उपरान्त हम सुभाष चौक आ गए जहां पर बहुत पुराना सेंट फ्रांसिस चर्च है, चारों तरफ देवदार के पेड़ हैं जो उसके शांत वातावरण को और गहरी खामोशी मे तब्दील कर देते हैं , चर्च में  जाकर आपको सुकून महसूस होगा । रात्रि का खाना  पुनः हमने गांधी चौक पर खाया जहां कई शाकाहारी भोजनालय हैं । होटल आ कर हमने सुबह की पेकिंग शुरू की क्योंकि मन हुआ कि हम यहाँ तक आए है तो अमृतसर मत्था टेक कर चलते हैं । जून के महीने में भी डलहौजी मसूरी, नैनीताल, ऋषिकेश, जैसी भीड़ लिए हुये नहीं था जिससे हम वहाँ की शांति को अनुभव कर पाए ।


21. चर्च का फोटो 

जब ऐसी किसी यात्रा का सुयोग होता है तो मुझे धर्मवीर भारती की किताब “ ठेले पर हिमालय “ का एक पेराग्राफ याद आ जाता है ।

“ 21 नवम्बर , 1956

जब आप जिंदगी के भीड़ भाड़ वाले राजमार्ग पर थके हारे , भीड़ की लहरों में धक्के खाते हुए , विवश आगे ढकेलते जा रहे हों और आपको अकस्मात एक छोटी पगडंडी रास्ते से फूटती दिखाई दे, जो परिचित हरीतिमा को गुदगुदाती हुई किसी अपरिचित ठिकाने को जा रही हो, तो मैं आप से आग्रह करता हूँ कि बिना कुछ भी सोचे समझे , जल्दी से, तमाम जरूरी से जरूरी काम छोड़कर उस पगडंडी पर मुड़ जाइए । कभी कभी थोड़ा पलायन बहुत स्वस्थ होता है । “

लगभग 70 साल बाद भी हम उसी भाग दौड़ भरी जिंदगी से फुरसत के कुछ लम्हे चुराना चाहते हैं , एक अलग सी स्फूर्ति , एक अलग सी ताजगी , एक अलग से उत्साह के लिए , शायद यही मानव स्वभाव है और इसीलिए आज भी उपरोक्त कथन कितना सार्थक प्रतीत होता है ।

 

चलिए दोस्तों , अगले सफर में मैं आपको ले चलूँगा अमृतसर की गलियों में , तब तक के लिए अलविदा, अभिवादन । मैं अपने अनुभवी साथी और बड़े भाई सदृश श्री हर्षवर्धन जोग जी का , जो काफी अनुभवी ब्लॉगर है , मार्गदर्शन एवं उत्साह बढ़ाने हेतु धन्यवाद देता हूँ ।

 

 

 

 

 

 





Thursday, July 16, 2026

जंगल में बाँधवगढ़

 


११-१२-२०२५

२०१३ में हम लोग कान्हा नैशनल पार्क की सपरिवार यात्रा दिल्ली से जबलपुर रेलगाड़ी से कर रहे थे । ट्रेन में सामान्य स्लीपर कोच में ही आरक्षण मिला, रास्ते में ऐसी मूसलाधार बारिश हुई कि पूरा कोच जलमग्न हो गया। ऐसे में खाने के साथ चाय की इच्छा हुई और ट्रेन में इलेक्ट्रिक केतली से भाई साहब ने चाय बनाकर पिलायी, जलमग्न ट्रेन के अंदर बारिश  में चाय पीने का आनंद ही कुछ और था । समय के साथ, भीड़-भाड़, आरक्षण आदि कारणों से अब यात्राएं ए.सी.कोच में या हवाई जहाज में होने लगी हैं, परंतु जो आनंद और अनुभव स्लीपर कोच का था, वो अविस्मरणीय है । कान्हा के सुंदर जंगलों में बहुत सुंदर पशु पक्षियों की भरमार थी, परंतु टाइगर (बाघ) के दर्शन बहुत दूर से हुए । उसी दौरान पता चला कि बाँधवगढ़ (मध्य प्रदेश) में टाइगर के दर्शन सुलभ और बहुत पास से हो जाते हैं । सोचा कि कभी मौका मिला तो बाँधवगढ़ की यात्रा जरूर करेंगे ।

एक दिन अचानक बड़े भाई ने फोन किया कि बाँधवगढ़ चलते हैं दिसंबर के दूसरे सप्ताह में, शनिवार, रविवार आधिकारिक छुट्टियाँ हैं और एक छुट्टी और लेकर प्रोग्राम बन जाएगा । दूसरे सप्ताह के बाद दिल्ली में अत्यधिक सर्दी और कोहरा हो जाता हैं, अतः यह सही समय था, सो मैंने तुरन्त हामी भर दी ।

११ दिसंबर को कार्यालय पूरा करने के बाद घर (गाजियाबाद) से सामान लेकर बड़े भाई के घर दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। भाई साहब के यहाँ से चारों यात्री (दोनों भाई सपत्नीक) निजामुद्दीन रेल्वे स्टेशन के लिए निकल गए । हमारी ट्रेन रात्रि ११ बजे की थी ।

अक्षरधाम के रास्ते से जाते हुए लगा कि लोग कहते हैं कि मुंबई रात भर चलती है लेकिन अब तो दिल्ली भी रात भर चलती है । हर कोई भागा जा रहा है न जाने कहाँ और न जाने किससे ।

१२-१२-२०२५  (मगधी ज़ोन)  

निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से ऊर्जाधानी एक्सप्रेस (२२१६८) ट्रेन से  हमें कटनी तक का सफर करना था जो कि बांधवगढ़ का एक पास का रेलवे स्टेशन है । ट्रेन लगभग एक घंटा विलंब से थी, अतः हम लगभग दोपहर १२ बजे पहुंचे । कटनी पहुँचने पर पता चला कि बड़े भाई ने बांधवगढ़ से दोपहर ३  बजे की मगधी ज़ोन की सफारी बुक कर रखी है । पता चला कि कटनी में तीन रेलवे स्टेशन हैं, हमें मुरवाड़ा स्टेशन उतरना था, अतः हरी भैया (ड्राइवर) को बोल दिया कि वो मुरवाड़ा स्टेशन आ जाएं ।

आप कहीं की यात्रा पर निकलते हैं तो एक तरीका तो यह है कि आप पहले से ही उस शहर, जगह की जानकारी ले लें या फिर आप चल दीजिए, फिर वहाँ जाकर  उसके इतिहास को खंगालिए । मेरी स्थिति दूसरी तरह की थी। क्योंकि एक तो कार्यालय एवं पारिवारिक व्यस्तता में यह शायद संभव नहीं था दूसरे बड़े भाई के होने से निश्चिंतता थी । उन्हें शुरू से बहुत ज्यादा जानकारी के साथ चलने की आदत और खास शौक है।

कटनी से निकल कर कुछ किलोमीटर दूर चलते ही हरी भैया ने सड़क किनारे एक दुकान पर गाड़ी रोक दी  -  छोटी सी हलवाई की दुकान, लगा कहाँ गाड़ी रोक दी, पर वहाँ गरम चाय के साथ कचोरी और पकोड़ी के साथ चटनी खाकर जो लाजवाब स्वाद आया तो इस लंबी यात्रा से जो थकान उत्पन्न हुई थी सब गायब हो गई । हम लोग आजकल बड़े ब्रांड के रेस्तराँ पर खाना पसंद करते हैं जिनमें अधिकतर खाना पहले ही बनाकर रखा जाता है जबकि इन छोटी जगहों पर आप बेहतर आम खाना खा सकते हैं जो काफी ज्यादा घर जैसा होगा । आप जब यात्रा पर निकलें तो स्थानीय व्यंजनों का लुत्फ जरूर लें जो आपको उस परिवेश में ढालने में मदद करते हैं । उसके बाद हरी भैया ने गाड़ी दौड़ा दी । दिल्ली के भयंकर ट्रैफिक से दूर सरपट दौड़ती गाड़ी, चारों तरफ खेत खलिहान, कम व्यवसायीकरण, एक अलग सुकून दे रहा था और आने वाली यात्रा की पृष्ठभूमि तैयार कर रहा था । यात्रा पर इस सुकून और शांति को महसूस करना चाहिए ।

उसके बाद हमारी गाड़ी सीधा बाँधवगढ़ टिकट काउन्टर के पास रुकी जो ताला नाका के पास है। आधार कार्ड से सत्यापन के पश्चात यात्रा का परमिट मिल गया। बाँधवगढ़ रिजर्व पार्क मुख्यतः  तीन ज़ोन में बँटा हुआ है:- मगधी ज़ोन, ताला ज़ोन, खितौली ज़ोन। सही कहा जाता हैं कि आप जंगल सफारी के लिए केवल टाइगर दर्शन हेतु सोचकर निकले हैं तो आप निराश हो सकते हैं । परंतु यदि आप के अंदर पहाड़ों की खामोशी, वहाँ के जीव जंतुओं के साथ तारतम्य बनाने की कला है, वहाँ की सादगी और शांति से जुडने और अहसास करने का मन है तो आप निस्संदेह बहुत खुश होकर जाएंगे । 

गाइड और ड्राइवर टिकट काउन्टर के बाहर ही मिल गए और उनके साथ बैठकर यात्रा शुरू की गई। दोपहर काफी गरम थी लेकिन ड्राइवर ने बताया कि चार बजे के बाद आपको सर्दी लगेगी । हमारे पास सिर के लिए टोपी, मफ़लर, जैकिट तो थी लेकिन हाथों के दस्ताने नहीं थे ।

सुनने में आया कि मगधी ज़ोन महामन टाईगर और उनके बच्चों डाटी, बमेरा और उनके बच्चों के लिए प्रसिद्ध है । परंतु वन्य जीव मनुष्य की भांति कौन सी सीमाओं में बंधे हुये हैं । लेकिन यात्रा में आगे चलकर पता चला कि हरेक टाइगर ने अपने एरिया को निर्धारित किया हुआ है और उसके अंदर किसी और का प्रवेश उसको पसंद नहीं है। मैं हैरान हूँ कि प्रकृति ने इंसानों को यह कितना महत्वपूर्ण सिद्धांत दिया है जबकि आज सारी दुनिया में सीमाओं की लड़ाई फैली हुई है । ऐसे में यह विचारणीय हैं कि यह किस हद तक सही है कि हम सभी जगह इन बेजुबानों के दायरे/ इलाकों को कम करने मे लगे हुये हैं, वहाँ पर घर, दुकान या कोई अन्य कार्य करके ।

वन्य जीवों में सूंघने की क्षमता ईश्वर ने मनुष्य से कहीं ज्यादा दी है। इसीलिए हमें बताया गया कि हिरण (चीतल ) टाईगर के आने पर अलार्म कॉल देता है। उसी के आधार पर ड्राइवर और गाइड आपको टाइगर साईट के लिए मदद करते हैं ।

पहली बार पता चला कि जंगल में ‘बफ़र ज़ोन’ और ‘कोर ज़ोन’ होते हैं । कोर ज़ोन जिसमें कोई इंसानी हस्तक्षेप नहीं होता है और वन्य प्राणी अपनी मर्जी से रहते हैं । पेड़, पौधे, तालाब, पानी के स्रोत सभी कुछ स्वाभाविक हैं । आपको प्रकृति के इकोसिस्टम से जोड़ते हैं जहां शाकाहारी जीव फल, पौधों से अपना पेट भरते हैं, वहीं माँसाहारी छोटे प्राणियों का भोजनकर अपना पेट भरते हैं । यही प्रकृति का संतुलन है।

बाँधवगढ़ टाईगर रिजर्व लगभग १५३६ वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इस रिजर्व पार्क में तीन मुख्य कोर ज़ोन हैं मगधी, ताला, खितौली , हमारी यात्रा का प्रारंभ मगधी ज़ोन से था । ड्राइवर ने सफारी गाड़ी को गेट पर गार्ड की अनुमति लेकर अंदर  किया ।

कुछ दूर चलते ही चारों ओर स्पाटिड डीयर (चीतल) के दर्शन हुये । उनका मासूम चेहरा, जरा सी आवाज से अलर्ट होने वाले कान और मदमस्त चाल आपको दीवाना और तरोताजा बना देंगे । और थोड़ी दूर गाड़ी बढ़ी तो सांभर के भी दीदार हो गए ।

 


जगह जगह  आपको दीमक से गिरे हुये पेड़ मिल जाएंगे जो भालू के लिए भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित कराते हैं । कोर ज़ोन की वजह से जो पेड़ जहां अपना कार्यकाल या जीवन पूर्ण करके गिर गए वो अब जमीन की उर्वरता में सहयोग देंगे । साथ ही पैरासाइट (विषबेल) पेड़ों को घेरकर उनको समाप्त करती दिख जाएंगी ।

 


पगमार्क के सहारे आगे बढ़ते हुये और कॉल का इंतजार करते हुये हम आगे बढ़ रहे थे । प्रकृति की संरचना में जीव-जन्तु-पेड़-पौधे किस तरह एक दूसरे से जुड़े हुए हैं आपको जंगलों मे आकर ही महसूस होगा । पेड़ों पर लंगूर चढ़े हुये हैं और खा कम रहे हैं और गिरा ज्यादा रहे हैं, नीचे हिरण मस्त होकर पत्तियां, फल जैसे आंवला, हरेड, बहेड़ा, फूल खा रहे हैं । इस दोस्ती का पता मुझे तो यहीं आकर चला । इसी की खातिर हिरण अपनी सूंघने की क्षमता से अलार्म कॉल देकर न केवल लंगूरों को बल्कि पूरे वन प्रदेश को सतर्क कर देते हैं । यह कार्य मुख्यतया सबसे बड़े पुरुष हिरण द्वारा किया जाता है जिसे आप लीडर भी कह सकते हैं । इसी कॉल की वजह से अगर बंदर पानी पी रहे हों या जमीन पर हों तो सचेत होकर पेड़ों पर चढ़ जाते हैं जहां टाइगर की पहुँच नहीं है। जंगल के अद्भुत नियम इंसानों की समझ के परे हैं ।



मगधी
ज़ोन से बाँधवगढ़ किले का विशालकाय पिछला हिस्सा दिखता है, जिसे देखकर आपके सामने राजा महाराजों का विशाल साम्राज्य, उनकी शानो-शौकत विशाल जंगल और उनकी बहादुरी का पराक्रम दिखाने के लिए इन निर्दोष वन्य जीवों की बलियाँ । यह सोच आपके शरीर में एक सिहरन पैदा कर देगी ।

आज की यात्रा में लौटते समय दो सियार तेजी से जंगल में अंदर की तरफ बढ़ रहे थे । उनका रोल सफाईकर्मी का बताया गया । जब जंगल में शिकार खाने के बाद टाइगर उन्हें छोड़ देते हैं तो सियार उसको पूरी तरह साफ कर देते हैं जिससे उनका पेट भी भर जाता है और इकोसिस्टम में गंदगी और बदबू भी नहीं फैलती है।



पहले दिन टाईगर दर्शन ना होने की निराशा सबके चेहरे पर थी । लौटकर वापिस मगधी गेट पहुँचने पर गाइड ने एक संदेश दिखाया :-

       “निराश ना हों शायद  मुझे नहीं देख पाए

       परंतु मैंने आपको देखा है।“

सच्चा , स्वाभाविक और मार्मिक संदेश ऊर्जा से भरा हुआ । टिकट काउन्टर पहुँच कर हमने गाइड और ड्राइवर का धन्यवाद किया । बड़े भाई साहब ने अगले दिन के टिकट की प्रक्रिया शुरू की । एक अन्य संदेश जिसने मेरा ध्यान खींचा :-

       “पार्क के अंदर जानवर कूड़ा नहीं फैलाते हैं । मनुष्य फैलाते हैं ।

       कृपया जानवरों की तरह व्यवहार करें ।“

 


इसको पढ़कर लगा कि मनुष्य ने ही शिष्टाचार से अशिष्टता की यात्रा तय की है जबकि जानवर आज भी शायद अपना जीवन इसी परम्परा से निर्वाह कर रहे हैं । यात्रा पूर्ण करके हम अपने रिज़ॉर्ट की तरफ निकल गए । बड़े भाई साहब ने यह व्यवस्था की थी अतः पूरी निश्चिंतता थी । स्प्री माटी जंगल रिज़ॉर्ट गाँव में था जहां गूगल मैप भी हरी भैया को चकमा दे रहा था । रिज़ॉर्ट जंगल एवं गाँव की पृष्ठभूमि पर बना हुआ था परन्तु तमाम आधुनिक सुख सुविधाओं के साथ, जैसे एक बड़े कॉमन स्विमिंग पूल के अलावा हर कॉटेज के साथ एक खुला स्विमिंग पूल ।

 


रिज़ॉर्ट में आकर थोड़ा विश्राम कर एवं नहा धोकर खाने की टेबल पर बैठ गए, दाल रोटी व सब्जी का ताज़ा सात्विक भोजन खाकर दिल खुश हो गया । सुबह की कड़ाके की सर्दी को ध्यान में रखते हुये उनसे कंबल की मांग सुबह की सफारी के लिए की गई ताकि खुली जीप में सर्दी से बचा जा सके । भोजन उपरान्त अपने कमरे में आने के बाद बाहर आसमान का नजारा अद्भुत था । चारों तरफ एक खामोशी और घने काले आसमान में टिम टिम करते तारे जो दिल्ली में बहुत कम या नहीं के बराबर दिखते हैं। कभी कभी ऐसी दूरी ऐसी यात्रा आपको ताजगी के अलावा जिंदगी में झाँकने का मौका देती है। मै रिज़ॉर्ट के दरवाजे से लगभग १० बजे बाहर निकला और पास के तालाब को देखने लगा तो गार्ड ने आकर अंदर चलने को कहा क्योंकि रिज़ॉर्ट ताला ज़ोन से लगभग १ कम दूर है और गर्मियों में जंगली जानवर यदा-कदा तालाब में पानी पीने आ जाते हैं ।

अगले दिन सुबह जल्दी उठना था अतः रात्रि विश्राम का निर्णय लिया गया । अगले दो दिनों के अवकाश को ध्यान में रखते हुये रिज़ॉर्ट में यात्रियों की आवक बढ़ रही थी ।

 १३.१२.२०२५  (ताला ज़ोन)

रिज़ॉर्ट में रात्रि विश्राम के बाद सुबह सभी जल्दी उठ गए । हरी भैया बाहर चलने के लिए तैयार थे । सफारी के लिए एक-एक कम्बल उन्होंने हमें रात में ही दे दिए थे । सुबह का नाश्ता भी उन्होंने पैक करके गाड़ी में रखवा दिया था, चाय पीकर हम निकल  गए और हरी भैया ने हमें टिकट काउन्टर तक छोड़ दिया । आज हमारी यात्रा ताला ज़ोन की थी और टाइगर दर्शन की इच्छा तीव्र हो रही थी क्योंकि इसके बाद हमारे पास एक दिन का समय और था । साथ ही अगले दिन रात्रि की वापसी की ट्रेन भी थी ।

इस ज़ोन की नैसर्गिक सुंदरता, बाँधवगढ़ फोर्ट, विष्णु भगवान की शेष शैय्या, पहाड़ी और मैदानी रास्ते, साथ ही टिकट काउन्टर पर पता चला कि इस ज़ोन में सबसे ज्यादा टाइगर साईट स्पॉट हैं । मन खुश था टाइगर दर्शन और इतिहास को और जानने की इच्छा से । ऐतिहासिक रूप से पता चला कि भगवान राम ने लंका विजय के उपरान्त किले का निर्माण कराकर उसे अपने भाई लक्ष्मण को दे दिया तभी इसका नाम बांधव + गढ़ = बाँधवगढ़ पड़ा ।

बाँधवगढ़ लगभग १५०० वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और लगभग २००० वर्ष पुराना है । भिन्न भिन्न राजाओं ने इस पर समय समय पर शासन किया । विशाल वन क्षेत्र उस समय के अनुसार शानदार शिकारगाह थे क्योंकि यहाँ पर प्रकृति और वातावरण, जलवायु की वजह से वन्य जीवों की उपलब्धता प्रचुर मात्रा में थी । जगह-जगह बने हुये मचान अभी भी आपको यहाँ के इतिहास की गवाही देते मिलेंगे ।

सफारी जीप, जो खुली होती है, में हम परिवार के चार लोग ही थे,अन्यथा सामान्य तौर पर छह लोग होते हैं । सुबह की भयंकर सर्दी के अनुरूप हमने टोपी, मफ़लर, जैकिट, कंबल सब कुछ ओढ़ लिया ताकि खुली जीप में खुद को सुरक्षित रखा जा सके । टिकट काउन्टर से ताला गेट तक वन विभाग की छोटी सड़क पर चलते हुये हम ताला गेट प्रवेश मार्ग पर पहुंचे। गेट खुलने से पहले ही जीपों की कतार थी वैधानिक औपचारिकताओं के बाद हमने प्रवेश किया ।

सफारी जीप चलने के कुछ समय बाद ही ड्राइवर को कॉल मिल गई । हम लोग उसी दिशा में आशा के साथ बढ़ गए । कॉल साफ और ऊंची थी, साथ ही टाइगर की दहाड़ भी सुनाई दी थी,  निःसन्देह अंदर टाइगर था । हम वहाँ इंतजार करने लगे । पंद्रह मिनट तक कशमकश के साथ इंतजार करने के बाद भी टाइगर बाहर नहीं आया और कॉल शान्त हो गई। ड्राइवर ने वहाँ से प्रस्थान करना उचित बोला और चल दिया क्योंकि स्टेयरिंग उसी के हाथ में था ।

टाइगर चार्जर और फ़ीमेल टाइगर सीता के सभी वंशज कहलाते हैं । वर्तमान में भीम का पुत्र बजरंग ताला ज़ोन का आकर्षण केंद्र है । ड्राइवर ने बताया कि बाँधवगढ़ किले में राम जानकी का मंदिर है जो जनता के लिए जन्माष्टमी और कबीर जयंती के दिन खुलता है । मुझे आश्चर्य हुआ कि राम-जानकी मंदिर जन्माष्टमी के दिन पूजा के लिए क्यों खुलता है। पता चला कि यहाँ पर राम जानकी को राधा कृष्ण के रूप में पूजा जाता है। बघेल राजाओं ने बाँधवगढ़ में सबसे ज्यादा समय तक शासन किया और उन्होंने ही इस मंदिर का निर्माण कराया । अभी यह मंदिर पर्यटकों के लिए नहीं खुला है ।

आगे चलने पर अद्भुत सूर्योदय का नजारा देखने को मिला, साथ ही विंध्याचल पर्वत की हरी भरी खूबसूरती का एहसास भी दिल को छू गया । ताला ज़ोन के रास्ते पथरीले, घुमावदार और थोड़े दुर्गम हैं । ड्राइवर भाई का साहस इन्हें आसान बना रहा था ।

 

इस यात्रा में जहाँ एक ओर दाहिनी तरफ ड्राइवर साहब तलाश करते हैं और बाईं तरफ गाइड दूर तक निगाह रखते हैं परन्तु यात्रियों को भी चारों तरफ नजर रखने के लिए बोला जाता है । यही कारण यात्रा को उत्सुकता और कौतूहल से भर देता है ।

अचानक भाई साहब को दूर एक तेंदुआ दिखाई दिया, जिसे हमने हलचल के आधार पर देखा । गाइड ने बताया कि तेंदुए की साइट थोड़ा मुश्किल होती है । परन्तु हमें यह संयोग मिला । जंगल में टाइगर अपना वन क्षेत्र निर्धारित कर लेते हैं और उसकी चौकसी करते रहते हैं । इनकी सूँघने की क्षमता अद्भुत होती है और इसी के आधार पर जब भी कोई दूसरा टाइगर इनके एरिया मे आकर अगर मूत्र त्याग कर गया होता है तो इन्हें पता चल जाता हैं कि कोई आया था ।

माना जाता है कि टाइगर जमीन पर खड़े होकर मुलायम पेड़ों पर, जहां तक उनका हाथ जाता है, अपने पंजों के निशान बना देते हैं और यह पंजों के निशान दूसरे टाइगर को चेलेंज देते हैं । दूसरा टाइगर पहले टाइगर से और ऊंचा निशान बनाते हैं जिससे इन्हें उसकी ताकत का अंदाजा होता है । यही चेलेंज जंगलों में इनकी प्रभुता की लड़ाई का कारण बनता है जो उनके एरिया को भी निर्धारित करता है । दूसरी तरफ, वैज्ञानिक आधार पर कहा जाता हैं कि टाइगर शिकार करने के बाद और उसे खाने के बाद अपने पंजे के नाखून पेड़ों पर साफ करते हैं ।

बाँधवगढ़ किले की तरफ जब आप चलते हैं तो रास्ते में भगवान विष्णु की शेषशय्या है, ड्राइवर का कहना था कि इस ओर भी टाइगर साइट होती हैं । लेकिन मैंने जब इस दृश्य को देखा तो यकायक मुझे अपनी दक्षिण भारत की यात्रा की याद आ गई । कन्याकुमारी की यात्रा के बाद आप जब वापसी में पद्मनाभन स्वामी मंदिर आते हैं तब आपको मंदिर में भगवान विष्णु के विश्राम अवस्था में दर्शन होते हैं, बिल्कुल श्याम और सलोने, चिरनिद्रा में लेटे हुये, साक्षात और अवर्णनीय, बहुत ही अलौकिक है वह दृश्य । मुझे वह मंदिर रामेश्वरम से भी ज्यादा दिल को छूने वाला लगा, अपनी यात्रा के आगामी चरणों में हम वहाँ भी चलेंगे ।

 


परन्तु बाँधवगढ़ में भगवान विष्णु शेषशय्या पर हैं । ड्राइवर ने बताया कि यह मूर्ति एक ही पत्थर से बनी हुई विशालकाय मूर्ति है जो लगभग १००० वर्ष से ज्यादा पुरानी है । लगता है कि मूर्तिकार ने,  अपनी शानो-शौकत, अपने साम्राज्य के घमण्ड से चूर हो जाने पर राजा महाराजों को इस अंतिम शाश्वत सत्य से रूबरू करने के लिए , इसे पूरे मन से गढ़ा था । साथ ही यह मनुष्य, जीव जंतुओं और प्रकृति का अद्भुत एहसास कराता है जहां हिंसा, मोह, मद, प्रेम, वैराग्य सबसे दूर सबसे अलग क्षणिक एहसास है ।

कहा जाता है कि यहीं पर निरंतर जल धारा का स्रोत है जो प्रकृति ने सभी के लिए समान भाव से दिया है । यहीं चरण गंगा का उदगम स्रोत है जो आगे चलकर सोन नदी के बाद गंगा जी में विलीन हो जाती है। यह बाँधवगढ़ का अद्भुत नजारा है जहां सूर्य की किरणें इसको अत्यंत सुंदर बनाती हैं । यहाँ से आगे किले का रास्ता पर्यटकों के लिए खुला नहीं है ।

किले के रास्ते में ही हमें राजाओं द्वारा घोड़ों के लिए बनवाए हुये अस्तबल भी मिले जो यह दास्तान बयां करते हैं कि उस जमाने में जब ना कोई मोटर गाड़ी थी, ना कोई हेलिकाप्टर था, ना ऐसे संसाधन थे तब भी उन्होंने ऐसे किले कैसे बनवाए होंगे ।

 


यह ज़ोन बाँधवगढ़ के मनुष्य निर्मित इतिहास से भरा पड़ा है । साथ ही मनुष्य और जानवरों के संग-साथ का भी साक्षी है । आज भी टाइगर दर्शन ना होने की कसक मन में थी। परन्तु बांधवगढ़ के रास्ते और गलियां आज कुछ जाने पहचाने से लगे ।

१४.१२.२०२५ (खितौली ज़ोन )

आज यात्रा का अंतिम पड़ाव आ गया था। यह सच है कि जब आप जंगलों की यात्रा पर निकले हों तो किसी विशेष प्राणी मात्र की चाह करना अनुचित एवं भेदभाव पूर्ण हैं और जंगल की आबोहवा, वनस्पति, जलवायु और अन्य विद्यमान प्राणियों के साथ अन्याय भी । फिर भी दिल में कहीं एक यह चाह थी कि जिस टाइगर के लिए बाँधवगढ़ टाइगर रिजर्व जाना जाता है, वह चाह इस यात्रा में अधूरी ना रह जाये ।

सुबह उठने पर पता चला कि आसमान में थोड़ा कोहरा और ठण्ड ज्यादा थी। ऐसे में टाइगर की संभावना करना मुश्किल था वैसे भी खितौली  में टाइगर स्पॉट कम ही हैं । सुबह मोबाईल के अलार्म से नींद खुली । स्प्री माटी जंगल (रिज़ॉर्ट )वालों ने कल की ही तरह नाश्ते (सेंडविच आदि) का सारा सामान टोकरी में रखकर गाड़ी में रखवा दिया था । सुबह की चाय, जिसकी आदत हम दोनों भाइयों को है और सर्दी की वजह से सब ने पी, लेकर रिज़ॉर्ट से प्रस्थान किया । हरी भैया ने हमें टिकट काउन्टर पर छोड़ दिया, जहां हमारे सफर के हमसफ़र दो अन्य साथी जंगल सफारी जीप में पहले से सवार थे। गाइड और दुर्गेश ने सीट संभाल ली। हमने परिचय के बाद पूछा कि खितौली में टाइगर साईट कैसी हैं, इतनी सर्दी में सुबह कैसा आलम रहता है । उन्होंने बताया कि कल भी सुबह के समय टाइगर साइट हुई थी ।

ईश्वर का नाम लेते हुये यात्रा आरंभ की, खितौली गेट पर आधार कार्ड से मिलान के बाद प्रवेश प्रारंभ हुआ । शुरुआत में दोनों तरफ आपको चीतल के समूह मिल जाएंगे । साथ में आपको हरे-भरे मैदान, तालाब और पानी के स्रोत मिल जाएंगे । कोहरे में सुबह-सुबह जंगली सूअर समूह में तेजी से कहीं जा रहे थे। गाइड ने बताया कि टाइगर और जंगली सूअर की लड़ाई लगभग एक से डेढ़ घंटे चलती है लेकिन विजय टाइगर की ही होती है ।

एक-एक वन क्षेत्र में टाईगरों ने अपने-अपने एरिया बांटे हुये हैं तथा कोई भी किसी के एरिया में अतिक्रमण नहीं करता है अन्यथा यह वर्चस्व की लड़ाई और युद्ध का आगाज होता है । खितौली ज़ोन टाइगर डी एम् और टाइग्रेस रा के लिए जाना जाता है । गाइड ने बताया कि कोर ज़ोन का ८०% भाग पशुओं के लिए आरक्षित है और केवल लगभग २०% हिस्सा पर्यटकों के लिए खुला हुआ है।

पिछले दो दिनों की यात्रा में हमें यह पता चल गया कि टाइगर के होने या आने पर हिरण किस तरह की आवाज में कॉल देते हैं। इसी कॉल के मिलने पर हम एक जगह सतर्क होकर टाइगर का इंतजार करने लगे । परन्तु काफी देर के इंतजार के बाद भी टाइगर ने बाहर मूव नहीं किया और निराशा हाथ लगी । जंगल में सभी लोग/ पर्यटक कॉल मिलने पर एक जगह आ जाते हैं, यह ड्राइवर एक दूसरे को जानकारी दे देते हैं । कुछ पत्थर के टीले ऐसे हैं जहां टाइगर दर्शन हो जाते हैं ।

 


गाइड ने बताया कि हम अब दराह बच्ची के एरिया में चलते हैं, शायद कुछ साईट हो जाए । रास्ते में हमें सांभर, जंगली मुर्गे, मेगपाई रॉबिन, अन्य पक्षियों के दर्शन हुए । उनका नैसर्गिक अंदाज आपका मन मोह लेगा। उसने समझाया कि आंवला, हरड़, बहेड़ा इन तीनों के पेड़ आपको आसपास मिलेंगे और इसी से त्रिफला का चूरन बनता है, इस तरह की प्रकृति की संरचना आपको प्रकृति की गोद में आकर ही पता चलेगी ।

सभी कोर ज़ोन के आसपास गाँव लगे हुए हैं, जहां जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है । गाइड ने बताया कि पड़ोस के गाँव को भी कोर ज़ोन के लिए घोषित होने पर लोगों को हरजाना दिया जाएगा ताकि वह दूसरी जगह विस्थापित हो सकें ।

दूसरी तरफ एक अलार्म कॉल मिलने पर हमारे ड्राइवर दुर्गेश ने गाड़ी उसी तरफ दौड़ा दी। पता चला कि टाइगर का मूवमेंट है , हल्का कोहरा और पीछे से सूरज की रोशनी के बीच टाइगर की हलचल दिखाई दी और ओझल हो गया। लेकिन अगले ही लम्हे टाइगर अपनी मदमस्ती में चलता हुआ दिखाई दिया उसका साइज़ लगभग सात फुट होगा। उसके बाद वह पेड़ों मे ओझल हो गया। ऐसा लगा कि देवी माँ ने अपनी सवारी के दर्शन करा दिए । चूंकि वो हमें हमारी दाहिनी ओर दिखाई दिया था और हम बीच रास्ते में जीप में थे तो सभी लोग उसकी क्रॉसिंग का इंतजार कर रहे थे। पंद्रह मिनट बीत गए पता चला कि वह बहुत तेजी से क्रॉस कर बफर ज़ोन की तरफ चला गया। लगा कि जिस यात्रा के लिए निकले थे वह सम्पूर्ण हो गई। यह दृश्य अलौकिक एवं अविस्मरणीय था । गाइड का कहना था कि कोई नया टाइगर है अतः इसका नाम नहीं पता ।

हरेक कोर ज़ोन में पर्यटकों की सुविधा के लिए कुछ एरिया नाश्ते आदि के लिए रखा गया है । अभी हम वहाँ से आधे घंटे की दूरी पर थे। सभी की भूख प्यास का ध्यान रखते हुये ड्राइवर ने गाड़ी उस दिशा की तरफ बढ़ा दी । चारों ओर शांत और सुरम्य जंगल के वातावरण को कभी-कभी आती पक्षियों की चहचहाहट और दिलकश बना रही थी । थोड़ी देर बाद जीप हॉल्टिंग एरिया मे पहुँच गई, वहाँ पहले से ८/१० जीप विद्यमान थीं । तकरीबन छह सात स्टॉल थे जहां पर चाय, मैगी, गरमागरम पकोड़ी की व्यवस्था थी । रिज़ॉर्ट से लाएं पराँठों और सब्जी के साथ गरम चाय सुकून दे रही थी । नाश्ते में लाए सेंडविच, पराँठे ड्राइवर, गाइड, सहयात्री और सबके लिए पर्याप्त थे । कुछ ऐसे ही स्टॉल ताला ज़ोन में थे ।

 

ठण्ड भरी सुबह में चाय के साथ पकोड़ियों का खाना हमेशा आनंददायक और स्वादिष्ट लगता है , नाश्ते में मजा आ गया । सभी लोग फ्रेश होकर वापिस तरोताजा हो गए, लगभग १०-३० का समय था । मैंने एक स्टॉल वाले से पूछा कि कभी यहाँ टाइगर नहीं आते, आपको डर नहीं लगता । उसका कहना था कि नहीं, वो कुछ नहीं कहते हैं । यह एरिया बफर ज़ोन के काफी करीब था । मेरा मन सोच रहा था, “मानवीय मजबूरियों में बेखौफ जिंदगी“ ।

ब्रेक के बाद यात्रा का पुनः आरंभ हुआ। कोर ज़ोन में मिट्टी की सड़कें हैं और जहां मुलायम मिट्टी में जानवर अपने पदचिन्ह छोड़ जाते हैं । दुर्गेश का कहना था कि अब हम इन्हीं पगमार्क के सहारे टाइगर को ढूँढने की कोशिश करेंगे । अपने अनुभव के आधार पर यह लोग यह जान लेते हैं कि कौन से पगमार्क टाइगर के हैं ।

मानवीय इच्छाओं, आवश्यकताओं और शहरीकरण ने इन जीवों के लिए उनके एरिया को सीमित कर दिया है । घने एवं शान्त जंगलों में इन विलुप्त प्रजातियों को ढूँढना बड़ा सुकून भरा और रोमांचक है । साथ ही कुछ समय कुछ लम्हों के लिए यह आपको शहरों की भाग-दौड़ से कहीं दूर ले जाकर तरोताजा कर देते हैं ।

रास्ते में नए-नए पक्षी और उनके नए नए रंग-रूप बहुत ही लुभावने थे, जगह-जगह पानी के स्रोत पर शुष्क पेड़ों पर बैठे यह पक्षी उसकी सुंदरता को बढ़ा रहे थे । रास्ते में हमें सांभर भी मिले और बरकिंग डिअर भी । गाइड ने बताया कि हिरण अपने सींग साल में एक बार गिरा देते हैं और नए सींग आते हैं । पुराने सींगों में काफी केलशियम होता है और उसे साही आदि जानवर खाते हैं ।

सुबह सुबह की साईट के बाद अब साईट होना मुश्किल है । क्योंकि अधिकतर टाइगर पूरी रात चलते हैं अपने भोजन आदि की व्यवस्था करने के लिए और अब आराम करना पसंद करते हैं । दूसरा अभी मौसम ना बहुत गरम ना बहुत ठंडा इसलिए भी दर्शन थोड़े दुर्लभ हैं ।

फिर भी साइटिंग के लिए प्रयास जारी था और अब तालाब के पास कॉल की उम्मीद से इंतजार किया गया। सर्दियों की बजाय गर्मियों में टाइगर तालाब आदि में पानी पीने या चूंकि उन्हें गर्मी बहुत लगती है तो पानी के स्रोतों में लेटे रहना पसन्द करते हैं और आपको आसानी से साइटिंग हो जाती है। गाइड ने अप्रैल मई का समय अधिक उपयुक्त बताया ।

खितौली ज़ोन ताला ज़ोन के मुकाबले काफी समतल है । अब हम गेट की तरफ बढ़ रहे थे । ड्राइवर ने गाड़ी रोकी जहां एक लंबे पेड़ पर दो जंगली उल्लू बैठे हुये थे । वो इसी पेड़ पर रहते हैं और उनका साइज़ लगभग एक फुट से ज्यादा होगा ।

 


गेट पर गाइड को वापिस जाने की एंट्री करनी होती है । खितौली गेट से छोटी सड़क टिकट काउन्टर तक आती है। सड़क के एक ओर खितौली ज़ोन और दूसरी तरफ मगधी ज़ोन है । यह सड़क आगे उमरिया जाती है जोकि बाँधवगढ़ के और ज्यादा पास का रेलवे स्टेशन है। इस सड़क के दोनों तरफ आपको स्पॉटड डियर (चीतल) मिल जाएंगे । हो सकता है आने वाले समय में बाँधवगढ़ टिकट काउन्टर तक कोई बाइपास निकल  जाए ताकि वन क्षेत्र को इन जीवों के लिए और अधिक क्षेत्र और सुरक्षा दी जा सके ।

यह यात्रा आपको प्रकृति से जोड़ने एवं प्राचीन काल और युग / अतीत में झाँकने का मौका देती है और साथ ही यह संदेश कि प्रकृति ने बिना पूछे इन जंगलों में सबके लिए व्यवस्था की है । इन्हीं जंगलों में हमारे पूर्वजों ने बाँधवगढ़ बसाया था जिसकी गलियों, पगडंडियों, जंगलों में आज हमने मिलकर झाँका ।

साथियो सबसे पहले वाले वृतांत/ संस्मरण / ब्लॉग (“नयाबास वाली गली”) में मात्राओं, वाक्यों, व्याकरण की  गलतियाँ हुई हैं , मैँ अपने साथी एवं लेखक योगेंद्र आहूजा जी का शुक्रिया करता हूँ मार्गदर्शन करने के लिए। मैं पुनः कहूँगा कि मैं कोई लेखक नहीं हूँ, अतः आप इन्हें क्षमा करें और भाव पर जाएँ । दूसरा, मुझे लगता है कि जब भी आप अध्ययन और यात्रा के लिए निकलें आपके पास शांत चित्त और फुरसत होनी चाहिए तभी आप उस भाव को समझ पाएंगे और तभी आप उस यात्रा को महसूस कर पाएंगे और असली आनंद उठा पाएंगे । तीसरा, मैं पहले नवीन या ताजी यानि कुछ समय पहले की गलियों में, मोहल्लों में, पर्यटन स्थलों में जा रहा हूँ जिनकी स्मृति जेहन में ताजा है । 

चलिए दोस्तो आपको फिर ले चलूँगा बचपन, जवानी की कुछ जानी पहचानी, कुछ अनजानी, कुछ सुनसान गलियों में, मोहल्लों में, एक नए शहर, नए देहात, नए कस्बे, नए गाँव, नए पर्यटन स्थल के साथ। तब तक के लिए अलविदा, अभिवादन ।



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