Thursday, October 1, 2026

पंबन ब्रिज से दक्षिण भारत (कन्याकुमारी) की रोमांचक यात्रा (Travelling from Pamban Bridge to Kanyakumari)

 

पंबन ब्रिज से दक्षिण भारत (कन्याकुमारी) की रोमांचक यात्रा (Travelling from Pamban Bridge to Kanyakumari) 

दक्षिण भारत की यात्रा काफी लंबे समय से स्थगित थी , अतः सोचा कि वहाँ की यात्रा रोमांचक और धार्मिक दोनों तरीकों से कर ली जाए । दूर की यात्रा होने की वजह से यह सोचा गया कि किसी ट्रैवल एजेंसी की सहायता ले ली जाए ताकि समय का सदुपयोग हो और यात्रा आरामदायक भी हो जाए। ऐसे में शार्प ट्रैवल, दिल्ली (Sharp  Travels India Limited - Delhi) की मदद ली गई जिन्होंने काफी बातचीत और विचार-विमर्श के बाद, हमारे हिसाब से रहन-सहन और घूमने के स्थान तय करके हमें एक 5-6 दिनों का यात्रा कार्यक्रम (Itinerary) बनाकर भेज दिया।इसी के आधार पर हमनें दिल्ली से मदुरै की सुबह जल्दी की फ्लाइट बुक कर दी थी। 1 नवम्बर 2025 को हमनें ऑफिस से घर आकर यात्रा की सारी पैकिंग कर ली ।

2 नवम्बर 2025

सुबह जल्दी एयरपोर्ट पहुँचकर 5 बजे की फ्लाइट ले ली । मदुरै में राजेश (टैक्सी ड्राइवर) एयरपोर्ट पर उपलब्ध था जो सीधे हमें होटल ले गया । पोपी’ज होटल सुन्दर और सुविधाजनक था, नाश्ता वगैरह करके हम मदुरै की यात्रा पर निकल पड़े । सबसे पहले सबसे मशहूर मीनाक्षी टेम्पल गए जहां राजेश ने मंदिर से पहले एक तरफ गाड़ी लगा दी । मंदिर के चारों दिशाओं में चार प्रवेश द्वार जिन पर देवी-देवताओं, जानवरों, संतों की कृतियाँ हैं, जो काफी रंगीन और खूबसूरत हैं । यह मंदिर माता मीनाक्षी जो माँ पार्वती का रूप है उनको और शिव जी को समर्पित है। अंदर कैमरा और मोबाईल ले जाना मना हैं । हमनें बाहर से ही प्रसाद ,फूल ले लिए । मंदिर में लगभग 1000 स्तम्भ हैं जिन पर द्रविड़ शैली की नक्काशी है, जो बहुत सुंदर है । मंदिर में माता रानी और शिव जी के दर्शन किए, विशाल ऊंचा मंदिर और फिर आसपास मार्केट । लौटने में जूते चप्पल ढूँढने में मुश्किल हुई अतः ध्यान रखें कि हमने चप्पल किस दिशा के द्वार के पास उतारी हैं।

वहाँ से हम चल दिए – तिरुमलई नायक पैलेस - इसका निर्माण मदुरै के राजा तिरुमाला नायक ने 16वीं शताब्दी में करवाया था। कहा जाता है कि इसके निर्माण में मुख्य योगदान इटली के एक वास्तुकार का था। इसी वजह से आप जब इसकी भव्यता, नक्काशी, इमारत को देखते हैं तो आपको द्रविड़-इतालवी वास्तुकला का संगम महसूस होता है। अंग्रेजों ने इसका विभिन्न प्रशासनिक कार्यों के लिए भी उपयोग किया और उसके बाद 1970 तक इसका उपयोग जिला न्यायालय के लिए भी किया गया। शाम को यहाँ लाइट एण्ड साउन्ड शो होता है जिसमें राजा के जीवन और उनके मदुरै में शासन के बारे में बताया जाता है। (फोटो नीचे देखें)

यूँ तो मदुरै मंदिरों का शहर है परंतु इसके बाद हम चल दिए योग नरसिम्हा पेरुमल मंदिर जो मदुरै से लगभग 8 किलोमीटर दूर है और जो विष्णु भगवान के शक्तिशाली अवतार भगवान नरसिम्हा जी को समर्पित है। पहाड़ी को काटकर बनाया गया यह एक गुफा मंदिर है, पहाड़ी की चढ़ाई मनोरम है। सामने तालाब है जहाँ आप मछलियों को दाना डाल सकते हैं । बाहर एक सज्जन सजीव चित्रकारी करते हुए मिले। 

3 नवम्बर 2025

अगले दिन बुफे ब्रेकफास्ट करके हम लोग टैक्सी से निकल गए रामेश्वरम के लिए । रास्ते में हम चाय आदि के लिए भी रुके । रास्ते में दिशा-निर्देश और अन्य बोर्ड स्थानीय भाषा में हैं । दोपहर को एक जगह रेस्टोरेंट में खाने के लिए रुके, काफी भीड़ थी । हमने अपनी आदत के अनुसार चपाती, आलू गोभी की सब्जी, दाल, इत्यादि बोल दिया। वहाँ बैठे अधिकतर सभी लोग साउथ इंडियन थाली खा रहे थे। आलू गोभी की रसेदार सब्जी को देखते ही माथा ठनक गया, और हमें दाल के साथ खाना खाना पड़ा । लगा कि गलत ऑर्डर कर दिया गया और समझ आया कि आप यहाँ दक्षिण भारतीय व्यंजनों का लुत्फ लीजिए। 

दोस्तों (विशेष तौर पर अभिषेक जी - पी एन बी) से दक्षिण की यात्रा के बारे में जब भी अनुभव साझा किया तो उन्होंने बताया कि पंबन ब्रिज देखने और महसूस करने की रोमांचक जगह है, समंदर के ऊपर बहुत लंबा पुल जो दोनों तरफ से खुला हुआ, केवल एक पटरी पर ट्रेन चल रही है, दोनों तरफ का दृश्य आपकी धड़कनें बढ़ाने के लिए काफी है। टैक्सी रामेश्वरम से पहले आने वाले पंबन ब्रिज के सड़क वाले पुल पर आ गई थी , जहां से दोनों तरफ समंदर का नजारा बहुत खूबसूरत है, एक तरफ रेलवे का ऐतिहासिक ब्रिज है। मन में इच्छा हुई कि ट्रेन का सफर रेलवे ब्रिज के ऊपर से किया जाए जो दोस्तों ने बताया था । परन्तु चेक करने पर पता चला कि इस समय मदुरै की दिशा से रामेश्वरम के लिए कोई पैसेंजर ट्रेन नहीं है। हाँ , लेकिन इसी समय पंबन रेलवे पुल के ऊपर से एक ट्रेन जा रही थी और नए एवं पुराने पुल को देखना अद्भुत था (फोटो नीचे देखें)  

पंबन ब्रिज पार करने के बाद, हम रामेश्वरम लगभग दो बजे के आसपास पहुँच गए । चलते हुए रास्ते में हमने देखा ऐसी शख्सियत का घर जिनके आगे सम्मान, श्रद्धा और इज्जत से सिर झुक जाता है, जी हाँ, मैँ बात कर रहा हूँ भारत के श्री ए पी जे अब्दुल कलाम जी की, उनके व्यक्तित्व से मेल खाता उनका साधारण घर (फोटो नीचे देखें ) जहां उनकी तस्वीरें , पुरस्कार आदि रखे हैं। थोड़ी दूर पर उनका म्यूजियम भी है जहाँ उनके योगदान , देश सेवा की तस्वीरें, अवॉर्ड, मेडल आदि हैं। 

इसके बाद हम चले गए भारत के दक्षिणी छोर के लिए जहां से श्रीलंका महज 18-20 किलोमीटर रह जाता है यानि धनुषकोडी के लिए, जिसके एक तरफ बंगाल की खाड़ी और एक तरफ हिन्द महासागर और अंत में उनका मिलन। रामेश्वरम से यहाँ तक का यात्रा मार्ग बहुत सुहावना है। कहते हैं कि कभी यहाँ पर रेलवे स्टेशन, पोस्ट ऑफिस, अस्पताल आदि के साथ एक बसा हुआ चलता फिरता शहर था और यहाँ से सीलोन (श्रीलंका) और अन्य देशों के लिए जल मार्ग आसान और सुगम था और व्यापारिक गतिविधियों के लिए उत्तम भी था । लेकिन 1964 में आए समुद्री तूफान ने पूरा शहर बर्बाद कर दिया और बर्बादी के कुछ बचे-खुचे निशान आज भी कहीं-कहीं मिल जाते हैं जिन्हें देखकर दुख लगता है और मन काँप जाता है उस मंजर को याद करके। धनुषकोडी का अर्थ धनुष की नोक है और कहा जाता है कि यहीं पर श्री भगवान राम ने अपने सैनिकों को धनुष की नोक की तरफ इशारा करते हुए समुद्र पर पुल बनाने के लिए कहा था। कहा जाता है कि यहीं से राम सेतु का प्रारंभ हुआ था परन्तु प्राकृतिक आपदाओं के कारण अब यह समुद्र में डूब गया है। इस छोर का नजारा अद्भुत है चारों तरफ नीला विस्तृत खुला आसमान और बिना छोर का दूर तक फैला हुआ नीला समंदर, दोनों किसी अनजान जगह पर मिलते हुए , हमारी सीमाओं की रक्षा करते हुए। अशोक स्तम्भ के साथ बना हुआ भारत का आखिरी पड़ाव, आखिरी सीमा।पहले चले गए हिंदुस्तान का आखिरी किनारा /सीमा देखने, जहां पर आपके मोबाइल में मैसेज आ जाएगा एयरटेल की तरफ से कि हम आपका श्रीलंका में स्वागत करते है मतलब वहाँ शायद श्रीलंका के टॉवर सिग्नल कैच करने लगते हैं। वहाँ आप दूरबीन से श्रीलंका के कुछ दृश्य ,दीवार आदि देख सकते हैं। आसपास छोटे छोटे स्टॉल लगे हुए हैं, मुझे सबसे ज्यादा पसंद अनानास की लंबी लंबी फाँके, जो पेट के लिए फायदेमंद और स्वादिष्ट, खाना सही लगा। आसपास राम जी और हनुमान जी के मंदिर भी हैं। 

                                             भारत का अंतिम छोर (धनुषकोडी ) 
वहाँ से हम आ गए रामेश्वर मंदिर के पीछे की तरफ जहां समंदर है और जहाँ परंपरा के हिसाब से आपको स्नान करना होता है । हमनें भी वहाँ स्नान किया और चल पड़े मंदिर की तरफ । टिकट लेकर आप लाइन में लग जाइए ताकि आप 22 कुंडों का स्नान कर सकें । पहले से वहाँ हर कुंड पर पंडित जी हैं जो हर कुंड से बाल्टी से पानी निकालकर आपके ऊपर डालते हैं स्नान हेतु । यह अनोखा स्नान है और बड़ा अच्छा भी लगता है। फिर आप कपड़े बदलकर मंदिर के मुख्य प्रांगण में दर्शन के लिए लाइन में लग सकते हैं । अंदर की कलाकृतियाँ और मूर्तियाँ देखने लायक हैं । मुख्य शिवलिंग के दर्शन दूर से और थोड़े अंधकारमय वातावरण में होते हैं  जहाँ  दीपक की मंद रोशनी ध्यान की एकाग्रता में मदद कर रही थी। कहते है श्री राम जी ने यहीं आकर शिव भगवान की स्तुति और आराधना की थी। मंदिर के अंदर गलियारे की नक्काशी और वास्तुकला देखने लायक है।


                                 रामेश्वरम मंदिर के दर्शन 

मंदिर के बाहर खाने पीने, जूस , सामान आदि की दुकानें हैं। मंदिर से निकल कर दिमाग सुबह ट्रेन से पंबन ब्रिज की यात्रा करने के लिए कसमसाने लगा। होटल आकर खाना खाया जो कि स्वादिष्ट था । रेलवे की समय सारिणी देखी तो पता चला कि सुबह 5.40 बजे रामेश्वरम रेलवे स्टेशन से ट्रेन है। हमारे होटल विन्यागा बाय  पापीस से रेलवे स्टेशन महज 150 मीटर की दूरी पर है यह हमारे लिए हौसला बढ़ाने वाली बात थी। एहतियात के तौर पर हमनें राजेश को भी बोल दिया कि सुबह जल्दी उठ जाना और यह प्रोग्राम तय हुआ कि हम रामेश्वरम से मंडपम तक रेलवे की यात्रा करेंगे और चूँकि मंडपम रेलवे स्टेशन ऑन रोड ही है तो वहाँ राजेश गाड़ी लेकर आ जाएगा ताकि हम वापस उनके साथ रामेश्वरम होटल आ जाएंगे।

4 नवम्बर 2025

सुबह जल्दी उठकर हम निकल गए रेलवे स्टेशन के लिए पैदल ही। हम काफी जल्दी स्टेशन पहुँच गए और टिकट ले ली, छोटा सा साफ-सुथरा रेलवे स्टेशन, पैसेंजर ट्रेन नंबर 06652 रामेश्वरम से मदुरै के लिए चल पड़ी सुबह के 5.40 पर, अगला स्टेशन था पंबन जंक्शन जो कि समंदर से कुछ पहले या यूं कहें कि पंबन ब्रिज से पहले। उसके बाद शुरू होती है वो रोमांचक यात्रा जिसकी बड़ी तमन्ना थी । चारों तरफ लंबा समंदर और बीच में पतले से पुल पर चलती हुई हमारी रेलगाड़ी, काफी थूक थूक वाली यात्रा छुक छुक  में। दोनों तरफ दूर तक नीला समंदर , ऊपर नीला आसमान, तेज हवा के झोंके, पानी को बोट वाला अहसास मगर कुछ डरावना, बेहद रोमांचक। तभी समझ में आया कि पुराना पुल जिसके दोनों तरफ कोई बैरिकेडिंग नहीं थी अब बंद हो गया है। साथ में बैठे एक परिवार से पता चला कि वे इसी ट्रेन से मदुरै जा रहे हैं जहाँ ट्रेन लगभग 9.30 पहुँचेगी।  यात्रा का यह विकल्प भी हमें अच्छा लगा । थोड़ी देर बाद आया मंडपम स्टेशन, आधे घंटे का यह सफर कब खत्म हो गया पता ही नहीं चला लेकिन इसका रोमांचकारी अनुभव अलग ही था जो जिंदगी भर याद रहेगा। कई फिल्मों की शूटिंग का गवाह है यह पंबन ब्रिज। 

रेलवे स्टेशन के बाहर निकले तो देखा राजेश प्रतीक्षा कर रहा था। टैक्सी से हम सड़क यात्रा सूर्योदय के साथ पंबन ब्रिज पार करते हुए रामेश्वरम होटल पर आ गए। 

नाश्ता बुफे में लगा था जहां बहुत स्वादिष्ट और लजीज साउथ इंडियन इडली, डोसा, दाल के पकोड़े थे और साथ में जूस, चाय और कॉफी। फिर हम निकल पड़े अपने अगले पड़ाव के लिए यानि कन्याकुमारी के लिए। रास्ते में तूतीकोरिन शहर भी आता है जो मोतियों का शहर कहलाता है। 
  रास्ते में नमक की खेती के दृश्य - एकदम अलग नजारा हमारे यहाँ की खेती से बिल्कुल जुदा (फोटो नीचे देखें )। 
                      लगभग चार बजे कन्याकुमारी के दर्शन (फोटो नीचे देखें ) 
 

बचपन में सरिता आदि किताबें पढ़ते समय विवेकानंद रॉक टेम्पल के दृश्य देखे थे सो चाहत थी कि एक बार भारत के उस आखिरी मुकाम को भी देखा जाए। कन्याकुमारी पहुँचकर हमने विवेकानंद रॉक मेमोरियल  के लिए फेरी का टिकट लिया और सफर की शुरुआत की। 

हम टिकट लेकर और कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर विवेकानंद रॉक स्मारक के दर्शन के लिए पहुँच गए जहाँ स्वामी विवेकानंद जी ने ध्यान किया था । स्थानीय मान्यता यह भी है कि यहाँ पर कन्याकुमारी देवी के रूप में माता पार्वती ने तपस्या की थी । सागर की लहरों के बीच आप आँखें मूँदकर कुछ लंबी गहरी साँसे लेकर थोड़े समय के लिए शांतचित बैठ सकते हैं, आपको सुखद महसूस होगा। यहीं से शीशे का ब्रिज पार करके दूसरी चट्टान पर संत थिरुवल्लुवर  की विशाल मूर्ति जो की तमिल भाषा के एक महान और अत्यंत प्रतिष्ठित दार्शनिक और कवि हैं, के दर्शन किए । 

इस यात्रा के बाद हम निकल गए कन्याकुमारी के सबसे खूबसूरत सूर्यास्त को देखने के लिए और किनारे पर बैठकर , पता चला कि कन्याकुमारी का सूर्यास्त इतना खूबसूरत क्यों कहा जाता है (नीचे फोटो देखकर महसूस करें)।  

 


                             कन्याकुमारी सूर्यास्त एक - नजारें अनेक 
हमने कन्याकुमारी के लघु मार्केट में कुछ मसाले इत्यादि खरीदे तो अच्छा लगा। रात्रि का नजारा कुछ अलग था (फोटो नीचे देखें)। हमारा होटल गोपीनिवास ग्रांड पास में ही था ।

सुबह उठकर होटल से दाहिनी तरफ जाकर खुली सड़क पर चाय पीने का लुत्फ अलग था और हमारे साथी कौवों को बिस्किट खिलाने का मजा भी अलग था । होटल में दक्षिण भारतीय नाश्ता करके हम चल दिए आगे की दक्षिण भारत यात्रा के लिए।  
दोस्तों जुड़े रहिएगा यात्रा अभी बाकी है, आपको पता चलेगा कि केरल को स्वर्ग क्यों कहा जाता है, हम चलेंगे उन महलों, समुद्र के किनारों और उन अद्भुत जगहों पर जहाँ समय ठहर जाता है। 

मेरे नए और पुराने संस्मरणों के लिए मेरी वेबसाइट Galiyara07.com विजिट करे। 

तब तक के लिए अभिवादन । 


 

 



कोवलम की उछलती लहरों से एलेप्पी के खामोश बेकवाटर तक (Kerala Trip - Kovalam to Alleppey Back Waters)

                              06.11.2025 कन्याकुमारी का सूर्यास्त, रात्रि विश्राम देखकर हम सुबह होटल गोपीनिवास में नाश्ता करके निकलगए पद्म...