पंबन ब्रिज से दक्षिण भारत (कन्याकुमारी) की रोमांचक यात्रा (Travelling from Pamban Bridge to Kanyakumari)
दक्षिण भारत की यात्रा काफी लंबे समय से स्थगित थी , अतः सोचा कि वहाँ की यात्रा रोमांचक और धार्मिक दोनों तरीकों से कर ली जाए । दूर की यात्रा होने की वजह से यह सोचा गया कि किसी ट्रैवल एजेंसी की सहायता ले ली जाए ताकि समय का सदुपयोग हो और यात्रा आरामदायक भी हो जाए। ऐसे में शार्प ट्रैवल, दिल्ली (Sharp Travels India Limited - Delhi) की मदद ली गई जिन्होंने काफी बातचीत और विचार-विमर्श के बाद, हमारे हिसाब से रहन-सहन और घूमने के स्थान तय करके हमें एक 5-6 दिनों का यात्रा कार्यक्रम (Itinerary) बनाकर भेज दिया।इसी के आधार पर हमनें दिल्ली से मदुरै की सुबह जल्दी की फ्लाइट बुक कर दी थी। 1 नवम्बर 2025 को हमनें ऑफिस से घर आकर यात्रा की सारी पैकिंग कर ली ।2
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सुबह
जल्दी एयरपोर्ट पहुँचकर 5 बजे की फ्लाइट ले ली । मदुरै में राजेश (टैक्सी ड्राइवर)
एयरपोर्ट पर उपलब्ध था जो सीधे हमें होटल ले गया । पोपी’ज होटल सुन्दर और
सुविधाजनक था, नाश्ता वगैरह करके हम मदुरै की यात्रा पर निकल पड़े ।
सबसे पहले सबसे मशहूर मीनाक्षी टेम्पल गए जहां राजेश ने मंदिर से पहले एक तरफ गाड़ी
लगा दी । मंदिर के चारों दिशाओं में चार प्रवेश द्वार जिन पर देवी-देवताओं, जानवरों, संतों
की कृतियाँ हैं, जो काफी रंगीन और खूबसूरत हैं । यह मंदिर माता मीनाक्षी जो माँ
पार्वती का रूप है उनको और शिव जी को समर्पित है। अंदर कैमरा और मोबाईल ले जाना
मना हैं । हमनें बाहर से ही प्रसाद ,फूल ले लिए । मंदिर में लगभग 1000 स्तम्भ हैं जिन पर द्रविड़ शैली की नक्काशी है, जो बहुत सुंदर है । मंदिर में माता रानी और
शिव जी के दर्शन किए, विशाल ऊंचा मंदिर और फिर आसपास मार्केट । लौटने में जूते
चप्पल ढूँढने में मुश्किल हुई अतः ध्यान रखें कि हमने चप्पल किस दिशा के द्वार के
पास उतारी हैं।
वहाँ से हम चल दिए – तिरुमलई नायक पैलेस - इसका निर्माण मदुरै के राजा तिरुमाला नायक ने 16वीं शताब्दी में करवाया था। कहा जाता है कि इसके निर्माण में मुख्य योगदान इटली के एक वास्तुकार का था। इसी वजह से आप जब इसकी भव्यता, नक्काशी, इमारत को देखते हैं तो आपको द्रविड़-इतालवी वास्तुकला का संगम महसूस होता है। अंग्रेजों ने इसका विभिन्न प्रशासनिक कार्यों के लिए भी उपयोग किया और उसके बाद 1970 तक इसका उपयोग जिला न्यायालय के लिए भी किया गया। शाम को यहाँ लाइट एण्ड साउन्ड शो होता है जिसमें राजा के जीवन और उनके मदुरै में शासन के बारे में बताया जाता है। (फोटो नीचे देखें)
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अगले दिन बुफे ब्रेकफास्ट करके हम लोग टैक्सी से निकल गए रामेश्वरम के लिए । रास्ते में हम चाय आदि के लिए भी रुके । रास्ते में दिशा-निर्देश और अन्य बोर्ड स्थानीय भाषा में हैं । दोपहर को एक जगह रेस्टोरेंट में खाने के लिए रुके, काफी भीड़ थी । हमने अपनी आदत के अनुसार चपाती, आलू गोभी की सब्जी, दाल, इत्यादि बोल दिया। वहाँ बैठे अधिकतर सभी लोग साउथ इंडियन थाली खा रहे थे। आलू गोभी की रसेदार सब्जी को देखते ही माथा ठनक गया, और हमें दाल के साथ खाना खाना पड़ा । लगा कि गलत ऑर्डर कर दिया गया और समझ आया कि आप यहाँ दक्षिण भारतीय व्यंजनों का लुत्फ लीजिए।
दोस्तों (विशेष तौर पर अभिषेक जी - पी एन बी) से दक्षिण की यात्रा के बारे में जब भी अनुभव साझा किया तो उन्होंने बताया कि पंबन ब्रिज देखने और महसूस करने की रोमांचक जगह है, समंदर के ऊपर बहुत लंबा पुल जो दोनों तरफ से खुला हुआ, केवल एक पटरी पर ट्रेन चल रही है, दोनों तरफ का दृश्य आपकी धड़कनें बढ़ाने के लिए काफी है। टैक्सी रामेश्वरम से पहले आने वाले पंबन ब्रिज के सड़क वाले पुल पर आ गई थी , जहां से दोनों तरफ समंदर का नजारा बहुत खूबसूरत है, एक तरफ रेलवे का ऐतिहासिक ब्रिज है। मन में इच्छा हुई कि ट्रेन का सफर रेलवे ब्रिज के ऊपर से किया जाए जो दोस्तों ने बताया था । परन्तु चेक करने पर पता चला कि इस समय मदुरै की दिशा से रामेश्वरम के लिए कोई पैसेंजर ट्रेन नहीं है। हाँ , लेकिन इसी समय पंबन रेलवे पुल के ऊपर से एक ट्रेन जा रही थी और नए एवं पुराने पुल को देखना अद्भुत था (फोटो नीचे देखें)
पंबन ब्रिज पार करने के बाद, हम रामेश्वरम लगभग दो बजे के आसपास पहुँच गए । चलते हुए रास्ते में हमने देखा ऐसी शख्सियत का घर जिनके आगे सम्मान, श्रद्धा और इज्जत से सिर झुक जाता है, जी हाँ, मैँ बात कर रहा हूँ भारत के श्री ए पी जे अब्दुल कलाम जी की, उनके व्यक्तित्व से मेल खाता उनका साधारण घर (फोटो नीचे देखें ) जहां उनकी तस्वीरें , पुरस्कार आदि रखे हैं। थोड़ी दूर पर उनका म्यूजियम भी है जहाँ उनके योगदान , देश सेवा की तस्वीरें, अवॉर्ड, मेडल आदि हैं।इसके बाद हम चले गए भारत के दक्षिणी छोर के लिए जहां से श्रीलंका महज 18-20 किलोमीटर रह जाता है यानि धनुषकोडी के लिए, जिसके एक तरफ बंगाल की खाड़ी और एक तरफ हिन्द महासागर और अंत में उनका मिलन। रामेश्वरम से यहाँ तक का यात्रा मार्ग बहुत सुहावना है। कहते हैं कि कभी यहाँ पर रेलवे स्टेशन, पोस्ट ऑफिस, अस्पताल आदि के साथ एक बसा हुआ चलता फिरता शहर था और यहाँ से सीलोन (श्रीलंका) और अन्य देशों के लिए जल मार्ग आसान और सुगम था और व्यापारिक गतिविधियों के लिए उत्तम भी था । लेकिन 1964 में आए समुद्री तूफान ने पूरा शहर बर्बाद कर दिया और बर्बादी के कुछ बचे-खुचे निशान आज भी कहीं-कहीं मिल जाते हैं जिन्हें देखकर दुख लगता है और मन काँप जाता है उस मंजर को याद करके। धनुषकोडी का अर्थ धनुष की नोक है और कहा जाता है कि यहीं पर श्री भगवान राम ने अपने सैनिकों को धनुष की नोक की तरफ इशारा करते हुए समुद्र पर पुल बनाने के लिए कहा था। कहा जाता है कि यहीं से राम सेतु का प्रारंभ हुआ था परन्तु प्राकृतिक आपदाओं के कारण अब यह समुद्र में डूब गया है। इस छोर का नजारा अद्भुत है चारों तरफ नीला विस्तृत खुला आसमान और बिना छोर का दूर तक फैला हुआ नीला समंदर, दोनों किसी अनजान जगह पर मिलते हुए , हमारी सीमाओं की रक्षा करते हुए। अशोक स्तम्भ के साथ बना हुआ भारत का आखिरी पड़ाव, आखिरी सीमा।पहले चले गए हिंदुस्तान का आखिरी किनारा /सीमा देखने, जहां पर आपके मोबाइल में मैसेज आ जाएगा एयरटेल की तरफ से कि हम आपका श्रीलंका में स्वागत करते है मतलब वहाँ शायद श्रीलंका के टॉवर सिग्नल कैच करने लगते हैं। वहाँ आप दूरबीन से श्रीलंका के कुछ दृश्य ,दीवार आदि देख सकते हैं। आसपास छोटे छोटे स्टॉल लगे हुए हैं, मुझे सबसे ज्यादा पसंद अनानास की लंबी लंबी फाँके, जो पेट के लिए फायदेमंद और स्वादिष्ट, खाना सही लगा। आसपास राम जी और हनुमान जी के मंदिर भी हैं।
रामेश्वरम मंदिर के दर्शन
मंदिर
के बाहर खाने पीने, जूस , सामान आदि की दुकानें हैं। मंदिर से निकल कर
दिमाग सुबह ट्रेन से पंबन ब्रिज की यात्रा करने के लिए कसमसाने लगा। होटल आकर
खाना खाया जो कि स्वादिष्ट था । रेलवे की समय सारिणी देखी तो पता चला कि सुबह 5.40
बजे रामेश्वरम रेलवे स्टेशन से ट्रेन है। हमारे होटल विन्यागा बाय पापीस से रेलवे स्टेशन महज 150 मीटर की दूरी पर
है यह हमारे लिए हौसला बढ़ाने वाली बात थी। एहतियात के तौर पर हमनें राजेश को भी
बोल दिया कि सुबह जल्दी उठ जाना और यह प्रोग्राम तय हुआ कि हम रामेश्वरम से मंडपम तक रेलवे की यात्रा करेंगे और चूँकि मंडपम रेलवे स्टेशन ऑन रोड ही है तो वहाँ राजेश
गाड़ी लेकर आ जाएगा ताकि हम वापस उनके साथ रामेश्वरम होटल आ जाएंगे।
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सुबह जल्दी उठकर हम निकल गए रेलवे स्टेशन के लिए पैदल ही। हम काफी जल्दी स्टेशन पहुँच गए और टिकट ले ली, छोटा सा साफ-सुथरा रेलवे स्टेशन, पैसेंजर ट्रेन नंबर 06652 रामेश्वरम से मदुरै के लिए चल पड़ी सुबह के 5.40 पर, अगला स्टेशन था पंबन जंक्शन जो कि समंदर से कुछ पहले या यूं कहें कि पंबन ब्रिज से पहले। उसके बाद शुरू होती है वो रोमांचक यात्रा जिसकी बड़ी तमन्ना थी । चारों तरफ लंबा समंदर और बीच में पतले से पुल पर चलती हुई हमारी रेलगाड़ी, काफी थूक थूक वाली यात्रा छुक छुक में। दोनों तरफ दूर तक नीला समंदर , ऊपर नीला आसमान, तेज हवा के झोंके, पानी को बोट वाला अहसास मगर कुछ डरावना, बेहद रोमांचक। तभी समझ में आया कि पुराना पुल जिसके दोनों तरफ कोई बैरिकेडिंग नहीं थी अब बंद हो गया है। साथ में बैठे एक परिवार से पता चला कि वे इसी ट्रेन से मदुरै जा रहे हैं जहाँ ट्रेन लगभग 9.30 पहुँचेगी। यात्रा का यह विकल्प भी हमें अच्छा लगा । थोड़ी देर बाद आया मंडपम स्टेशन, आधे घंटे का यह सफर कब खत्म हो गया पता ही नहीं चला लेकिन इसका रोमांचकारी अनुभव अलग ही था जो जिंदगी भर याद रहेगा। कई फिल्मों की शूटिंग का गवाह है यह पंबन ब्रिज।
रेलवे स्टेशन के बाहर निकले तो देखा राजेश प्रतीक्षा कर रहा था। टैक्सी से हम सड़क यात्रा सूर्योदय के साथ पंबन ब्रिज पार करते हुए रामेश्वरम होटल पर आ गए।हम टिकट लेकर और कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर विवेकानंद रॉक स्मारक के दर्शन के लिए पहुँच गए जहाँ स्वामी विवेकानंद जी ने ध्यान किया था । स्थानीय मान्यता यह भी है कि यहाँ पर कन्याकुमारी देवी के रूप में माता पार्वती ने तपस्या की थी । सागर की लहरों के बीच आप आँखें मूँदकर कुछ लंबी गहरी साँसे लेकर थोड़े समय के लिए शांतचित बैठ सकते हैं, आपको सुखद महसूस होगा। यहीं से शीशे का ब्रिज पार करके दूसरी चट्टान पर संत थिरुवल्लुवर की विशाल मूर्ति जो की तमिल भाषा के एक महान और अत्यंत प्रतिष्ठित दार्शनिक और कवि हैं, के दर्शन किए ।
इस यात्रा के बाद हम निकल गए कन्याकुमारी के सबसे खूबसूरत सूर्यास्त को देखने के लिए और किनारे पर बैठकर , पता चला कि कन्याकुमारी का सूर्यास्त इतना खूबसूरत क्यों कहा जाता है (नीचे फोटो देखकर महसूस करें)।
सुबह उठकर होटल से दाहिनी तरफ जाकर खुली सड़क पर चाय पीने का लुत्फ अलग था और हमारे साथी कौवों को बिस्किट खिलाने का मजा भी अलग था । होटल में दक्षिण भारतीय नाश्ता करके हम चल दिए आगे की दक्षिण भारत यात्रा के लिए।



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बढ़िया वृतांत लोहिया जी। पहले रॉक मेमोरियल और कवि तिरुवल्लुवर मेमोरियल में ब्रिज नहीं था लेकिन अब देख कर अच्छा लगा। सैर सपाटे में- eat local eat seasonal- फार्मूला हमें ठीक लगा। वहाँ जाकर यहाँ जैसा खाना नहीं मिल पाता। २२ कुंडों के स्नान का अपना ही आनंद है! लिखते रहिए शुभकामनाएँ 💥- हर्ष वर्धन
ReplyDeleteधन्यवाद हर्षवर्धन जी (ब्लॉगर) , यह अधिकतर वो इलाके हैं जहाँ सभी कभी न कभी गए होंगे , पढ़कर आपको अपनी पुरानी यादें सामने आ जाती हैं। आपने सही कहा ,आप स्थानीय खाना खाएं तो ज्यादा बेहतर हैं। उसका स्वाद भी बहुत अच्छा होता है । रामेश्वरम हम सभी के लिए एक माना हुआ तीर्थ स्थान है इसलिए यात्रा अच्छी लगती है । आपको अच्छा लगा - साभार ।
DeleteVery well described these places Lohia ji. I visited these places in 90s. Purani yaden taza ho gayi. Please keep writing. My well wishes to you
ReplyDeleteThanks a lot Sir, purpose of all these journeys or Yatra Sansmaran (memoir) is to remember all those golden days, enjoyed with our families, friends, relatives etc. I respect your wishes and these encourage me to write more and more. With regards Sir.
Deleteयात्रा का वार्तान्त बहुत ही सुन्दर ढंग से किया गया है |
ReplyDeleteधन्यवाद सिंघल साहब , आपको यात्रा वृतांत अच्छा लगा हर्ष की बात है और हौंसला बढ़ाने वाली भी , साभार
Deleteश्री अशोक रस्तोगी जी (पंजाब नैशनल बैंक मेरठ) व्हाट्स एप पर लिखते है :- प्रिय लोहिया जी , आपने यात्रा वर्णन का वास्तव में बड़े ही सजीव तरीक़े से चित्रण किया है। वर्ण विन्यास एवम् छायाचित्रों का संकलन बड़ा ही मनोरम है। आपकी लेखन कला बहुत ही सराहनीय है। आपको बहुत-बहुत बधाई ।
ReplyDeleteधन्यवाद रस्तोगी साहब आपको यात्रा वृतांत जीवंत और पठनीय लगा यह मेरे लिए खुशी की बात है । आपको फ़ोटोज़ भी अच्छे लगे , साभार , यह मेरे लिए हिम्मत बढ़ाने वाली बातें हैं । - एस के लोहिया
DeleteAdesh Mohan Goyal Ji (London) has sent a message over What's app :- Beautifully written like a poet with rememberable photos.
ReplyDeleteThanks a lot Goyal Saheb, your enjoyed travel memoir, this is a big encouragement for me Sir.
ReplyDeleteअशोक अग्रवाल जी (पी एन बी मेरठ) व्हाट्स एप पर लिखते है :- बहुत शानदार विवरण। कन्याकुमारी तीन बार जाने का मौका मिला है। बहुत ही शानदार और प्राकृतिक सुंदरता से पूर्ण स्थान।
ReplyDeleteधन्यवाद अग्रवाल साहब, आपने सही कहा है, प्रकृति ने अपना दिल बिखेर रखा है , कन्याकुमारी लाजवाब है, आपको यात्रा संस्मरण अपनी यादों से जोड़ता हुआ मिला, इसके लिए शुक्रिया - एस के लोहिया
Deleteयात्रा वृत्तांत पढ़ अपनी कन्याकुमारी यात्रा 2014 की याद आ गई। बहुत सुंदर लिखा एवं तस्वीरों से तालमेल बैठा कर और अच्छा हो गया। दक्षिण भारत यात्रा में जो मुफ्त में हवा खाने को मिलती है वह हमेशा याद रहती है लोकल खाने के साथ साथ।
ReplyDeleteसुधीर निंद्राजोग
मेरठ
धन्यवाद सुधीर भाई, आपने सही याद दिलाया कन्याकुमारी में तो हवा की रफ्तार और आलम ही अलग है , आपको यात्रा संस्मरण पढ़कर अपनी यात्रा याद आ गई यह खुशी की बात है, साभार - एस के लोहिया
Deleteपुरानी यादें ताजा हो गई। अगर आपने ध्यान दिया हो तो २२ कुण्डों में एक गया जी का कुंड भी है। आपने अनुभव किया होगा पामबन पुल का रोमांच जो मै कभी आपसे साझा किया था।
ReplyDeleteसरल और सुंदर यात्रा वृत्तांत ।
धन्यवाद अभिषेक जी , आपको यात्रा वृतांत पढ़कर वापस उन गलियों की याद आ गई , यह बढ़िया बात है , आपने तो पुराने वाले पंबन ब्रिज का अनुभव किया था , लेकिन यह यात्रा भी रोमांचक थी। कुंड के बारे में एक और जानकारी मिली, साभार - एस के लोहिया
Deleteपंबन ब्रिज से कन्याकुमारी तक की यह यात्रा केवल स्थानों का विवरण नहीं, बल्कि समुद्र, आस्था, इतिहास, रोमांच और स्मृतियों से होकर गुजरने वाला एक जीवंत अनुभव है। इसे पढ़ते हुए कई बार लगा कि हम भी लोहिया जी के साथ उसी यात्रा में शामिल हैं। कभी पंबन ब्रिज के ऊपर समुद्र को निहार रहे हैं, कभी धनुषकोडी के अंतिम छोर पर खड़े हैं और कभी कन्याकुमारी के सूर्यास्त का इंतजार कर रहे हैं।
ReplyDeleteइस यात्रा-वृत्तांत की सबसे बड़ी खूबी इसकी सहजता और आत्मीयता है। मंदिर, महल, संग्रहालय और प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों के साथ चाय की दुकान, भोजन का अनुभव, रेलवे स्टेशन, स्थानीय बाजार और छोटी छोटी घटनाओं को भी लोहिया जी ने जगह दी है। यही बातें इसे किसी पर्यटन गाइड के बजाय एक वास्तविक यात्री का अनुभव बनाती हैं।
पंबन ब्रिज की रेल यात्रा इस वृत्तांत का सबसे रोमांचक हिस्सा है। समुद्र के बीच से गुजरती ट्रेन, दोनों ओर फैला नीला पानी और तेज हवाओं का वर्णन पाठक को उस क्षण में पहुँचा देता है। वहीं धनुषकोडी का उजड़ा हुआ अतीत और रामेश्वरम के मंदिर का आध्यात्मिक वातावरण यात्रा में गहराई जोड़ता है। कन्याकुमारी में विवेकानंद रॉक मेमोरियल को बचपन की स्मृतियों से जोड़ना इसे एक सुंदर भावनात्मक स्पर्श देता है।
लोहिया जी की खूबी यह है कि वे केवल सुंदरता नहीं देखते, बल्कि उस सुंदरता के पीछे छिपे इतिहास और मानवीय अनुभव को भी महसूस करते हैं। यही दृष्टि इस यात्रा-वृत्तांत को रोचक बनाती है।
हाँ, इसे और प्रभावशाली बनाने के लिए कुछ स्थानों पर विवरण थोड़ा संक्षिप्त करके, स्थानीय लोगों के संवाद, लोककथाओं तथा व्यक्तिगत अनुभूतियों को थोड़ा और स्थान दिया जाए तो रचना में साहित्यिक गहराई बढ़ेगी। ऐतिहासिक या धार्मिक तथ्यों में जहाँ लोकमान्यता हो, वहाँ उसे स्पष्ट रूप से मान्यता के रूप में प्रस्तुत करना, जैसे मान्यता है कि या कहा जाता है कि, जैसे वाक्यांश का उपयोग भी किया जाना उचित होता है।
कुल मिलाकर यह एक सरल, आत्मीय, रोचक और पढ़ते पढ़ते साथ ले चलने वाला यात्रा-वृत्तांत है। इसमें घुमक्कड़ का उत्साह भी है, श्रद्धालु का भाव भी और जिज्ञासु मन की खोज भी।
अब प्रतीक्षा रहेगी यात्रा के अगले पड़ाव केरल की। निश्चय ही वहाँ की कहानी भी इसी आत्मीय अंदाज में पढ़ने का आनंद देगी।
धन्यवाद वर्मा साहब आपने सम्पूर्ण यात्रा वृतांत का एक खूबसूरत सारांश लिख दिया है । आपके सुझाव सराहनीय और आमंत्रित हैं । मैँ आपके मार्गदर्शन के लिए हमेशा आभारी रहूँगा । आप अगर पढ़ते समय साथ साथ यात्रा करते है तो यह बहुत उत्साह की बात है। हौंसला बढ़ाने के लिए धन्यवाद , हम ऐसे ही यात्रों के सिलसिले पर चलते रहेंगे - एस के लोहिया
Deleteसुंदर यात्रा वृत्तान्त है । अपने देश की नयी-नयी जगहों को आप सिर्फ एक tourist की निगाह से नहीं, एक अन्वेषण जिज्ञासु की तरह देखते हैं । हर जगह के इतिहास, भूगोल और संस्कृति को जानना-समझना चाहते हैं । यह अपने देश के लिए आपका प्रेम दर्शाता है और यही आपके यात्रा वृत्तान्तों को पाठकों के लिए और भी रोमांचक और उपयोगी बनाता है ।
ReplyDeleteधन्यवाद आहूजा साहब, यात्रा वृतांत अगर जगह को घुमाने के साथ साथ संक्षेप में थोड़ी जानकारी भी दे सके यही प्रयास रहेगा । आपको यात्रा वृतांत अच्छा लगा , इसके लिए शुक्रिया ।
Delete