Tuesday, August 11, 2026

अमृतसर से अटारी बॉर्डर (TRAVEL MEMOIR - AMRITSAR TO ATTARI BORDER)

अमृतसर से अटारी बॉर्डर  (TRAVEL MEMOIR -  AMRITSAR  TO ATTARI BORDER) 


4 जून 2026

अमृतसर घूमने की इच्छा से हमने सुबह छह बजे बिना नाश्ता किए ही डलहौजी को अलविदा कह दिया। बनीखेत पार करके रास्ते में एक खुले और बड़े ढाबे में चाय नाश्ता किया। हिमाचल के इस रास्ते में CNG मिलने में थोड़ी परेशानी हुई। अमृतसर में रोजाना लाखों पर्यटक दर्शन और घूमने के लिए आते हैं, अतः गोल्डन टेम्पल की विशालकाय कार पार्किंग है। ड्राइवर ने गाड़ी पार्किंग में लगा दी, वहीं एजेंट ने हमें अच्छा होटल एक दिन के लिए दिलवाने की बात कर ली और हमारे साथ हो लिया। हमने कहा कि होटल गोल्डन टेम्पल के पास होना चाहिए। मेरे दोस्त ने मुझे एसजीपीसी की सारा गढ़ी सराय में कमरा बुक करने के लिए बोला था क्योंकि उनकी व्यवस्था बहुत अच्छी है  लेकिन हमारा कार्यक्रम दो दिन पहले ही बना था, तो बुकिंग नहीं मिली। एजेंट हमें पुरानी लक्कड़ मण्डी वाली गली में ले आया और वहाँ हम जी सी ग्रांड इन होटल में रुके, जो कि जलियाँवाला बाग और गोल्डन टेम्पल से पैदल दूरी पर एक छोटा और साफ सुथरा होटल है।

ना केवल लक्कड़ मंडी वाली गली बल्कि पूरा अमृतसर एक ऐतिहासिक शहर है। यह भारत का वो शहर है जिसने बंटवारे का सबसे बड़ा दंश या त्रासदी बहुत नजदीकी से और बहुत इंतहा के साथ सहा। लक्कड़ मंडी में अधिकतर लोगों ने अपने घर होटल में तब्दील कर दिए हैं और जब होटल से लगे हुए एक रिहायशी मकान के बुजुर्ग मालिक से बात हुई तो पता चला कि उनका परिवार यहाँ 100 साल पहले से रहता था। मतलब, परिवार ने आजादी की लड़ाई, बंटवारे की व्यथा, अंग्रेजों के जुल्म, सायरन की आवाजों के तले दबी खौफनाक रातें, अनिश्चितता के गर्भ में दबा भविष्य, सब कुछ देखा, महसूस किया, झेला था और जिसके जख्म आज भी कहीं हरे हैं। इतिहास खँगालने पर पता चलता है कि यह शहर भी कभी खुशमिजाज और मस्ती, जिंदादिली वाले माहौल का था। इस बात का पता आपको चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी “उसने कहा था” से चलता है जिसकी शुरुआत इक्के वाले (ताँगे वाले) की मिट्ठी पञ्जाबी जुबान से होती है—

“कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती, तो उनकी वचनावली के ये नमूने हैं—हट जा जीणे जोगिए; हट जा करमाँवालिए; हट जा पुत्तां प्यारिए; बच जा लंबी वालिए। समष्टि में इनके अर्थ हैं, कि तू जीने योग्य है, तू भाग्यों वाली है, पुत्रों को प्यारी है, लंबी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहिए के नीचे आना चाहती है?—बच जा।“

समय के साथ यह धरा दर्द भरे दौर से गुजरी है। परंतु आज न वो ताँगे वाले हैं और ना ही वो जुल्म करने वाले लोग। हाँ, कुछ गहरे निशान बाकी हैं। शहर वापस खुशमिजाज, जिंदादिल, भाईचारे वाले लोगों से भरा हुआ है। धरा वापस अपनी महक को ले आई है।

होटल के रीसेप्शन पर पूछताछ के बाद, 12 बजे के बाद हम पैदल ही जलियाँवाला बाग निकल गए जो कि काफी करीब था (फोटो नीचे देखे)। बाग में प्रवेश करने के बाद बाईं तरफ एक ऑडिटोरियम में फ़ोटोज़ भी लगे हैं और ऊपर एक डॉक्यूमेंट्री परदे पर दिखाई जाती है। उस समय के जुल्म, दर्द, होश उड़ाने वाले मंजर हैं। दीवारों पर आज भी गोलियों के निशान आपको मिल जाएंगे। सरकार ने इसका स्वरूप रखरखाव के हिसाब से संवार दिया है। बाग के बाहर पापड़, अमृतसर बड़ियाँ, छोले कुलचे, जूतियों, कपड़ों आदि की दुकानें हैं।

                          जलियाँवाला बाग , अमृतसर 

मेरे एक साथी यहाँ बैंक में कार्यरत हैं। उनसे रास्ते में ही हमने पूछ लिया था कि छोले कुलचे कौन-सी दुकान के मशहूर है। समय को ध्यान में रखते हुए और यह जानते हुए कि अटारी बॉर्डर के लिए लगभग 3 से 4 बजे के बीच निकलना होगा, एक रिक्शा वाले से बात की और हम चल पड़े केशर दा ढाबा के लिए।रास्ते में पार्टिशन म्यूज़ीयम और उसके सामने ब्रदर्स ढाबा और ब्रा दा ढाबा, दोनों अमृतसर की बेहद मशहूर जगह हैं, लेकिन समय की कमी की वजह से वहाँ जाना ना हो सका। केशर दा ढाबा अपने साफ-सुथरे वातावरण और लजीज खाने के लिए मशहूर है।

                          केशर दा ढाबा , अमृतसर 

हमने वहाँ से पूछकर पहलवान दा ढाबा वाले के छोले कुलचे के लिए ले जाने के लिए रिक्शा वाले को बोल दिया, लेकिन उसने आर्शी कुल्चा कॉर्नर, घी मण्डी चौक, ले जाकर रिक्शा रोक दिया। बाहर से देखकर लगा कि उसने कहाँ लाकर रोक दिया है। दुकान के मालिक से भी बात की। उसने कहा कि आप एक बार खाकर देख लीजिए, फिर बताना। हम बड़े अनमने मन से अंदर चले गए। उसने गरम-गरम छोले कुलचे और लस्सी दी। क्या स्वाद था; खाकर बहुत अच्छा लगा। आप जब भी यात्रा पर निकलें तो स्थानीय व्यंजनों का लुत्फ अवश्य लें और अमृतसर तो विशेष तौर पर अपने जायकेदार खाने के लिए मशहूर हैं।

                         आरशी कुल्चा कॉर्नर, अमृतसर 

उसके बाद हमने रिक्शा वाले को कपड़ा मार्केट चलने के लिए बोल दिया। उसने 15 मिनट बाद एक बड़ी से दुकान के बाहर ले जाकर रिक्शा खड़ी कर दी। हम विश्वास करके अंदर चले गए, लेकिन कोई खास बात नहीं रही, फिर भी याद के लिए कुछ सूट ले लिए। वास्तव में हम अमृतसर के असली कपड़ा मार्केट नहीं पहुँच पाए। 

वापस होटल में आकर, हमारे दिल्ली के एक साथी जो वहाँ पोस्ट थे, उनसे मुलाकात की और बहुत अच्छा लगा। पुराना साथ बिताया हुआ समय फिर याद किया। उनके जाने के बाद हमने ड्राइवर को फोन करके कहा कि गाड़ी निकाल ले ताकि अटारी बॉर्डर जा सकें क्योंकि लगभग चार बजने वाले थे और लग रहा था कि इतनी गर्मी में परेड देखने के लिए खुले में कैसे बैठेंगे। खैर, पार्किंग में ही जाना पड़ा, गाड़ी से चलने के लिए। रास्ते में अचानक आँधी, तूफान और बारिश आ गई। मौसम खुशगवार हो गया था। लगभग पाँच बजे हम वहाँ पहुँच गए और गाड़ी पार्किंग में लगा दी। समय और दूरी (लगभग 500 मीटर) को देखते हुए, वहाँ से रिक्शा करनी पड़ी, पहुँचकर हम प्रवेश के लिए लाइन में लग गए। औरतों और मर्दों की अलग-अलग लाइन थी। लेकिन अंदर प्रवेश से पहले आप एक साथ हो जाते हैं। बहुत बड़ा दरवाजा और बिल्डिंग है (नीचे फोटो देखें)।


                           अटारी बॉर्डर , अमृतसर            

आप घुसने से पहले देखेंगे कि बिल्डिंग के दोनों तरफ आपको हरे-भरे खेत और एक लोहे के तारों की बाड़ दिखाई देगी। यही बटवारे की निशानदेही है जिसे हम इंसानों ने खींच दिया।परिंदे आज भी इस खेत से उस खेत बेखौफ जा रहे हैं, हवाएँ आज भी अपनी ठंडक और सुकून बिना किसी जात, धरम, देश के सबको खुशियाँ दे रही हैं, तितलियाँ आज भी सीमाओं के बंधन से परे घूम रही हैं। यहाँ से लाहौर केवल 22 किलोमीटर दूर है, लेकिन इन दीवारों के बाद, इन सीमाओं के बाद, लगता है कि कितना दूर है। यह जगह आप रुककर देखेंगे, तो आपको एक अलग एहसास और जज्बा देगी। हाल ही में इम्तियाज़ अली की फिल्म “मैं वापस आऊँगा” देखी थी जिसने विभाजन के मुद्दे को बड़े संजीदा तरीके से छुआ था।लेकिन कितना मुश्किल है वापस जाना, वापस रहना, उन गलियों में, उन शहरों में जो सीमाओं और जात-पात के बंधनों में बंध गए हैं और जिन्हें इतिहास ने जुल्म और सितम के रंगों से रंग दिया है। उम्र के इस पायदान पर अपनी मातृभूमि, अपने शहर, अपने दोस्तों, अपने परिवार और करीबी का खिंचाव लाजमी है।

अंदर जाकर काफी ऊपर सीढ़ियाँ चढ़कर परेड देखने के लिए जगह मिली। हमारी तरफ हमारे सैनिक अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं और दूसरी तरफ पाकिस्तान के सैनिक। हमारा ओपन ऑडिटोरियम खचाखच भरा था। सैनिकों का प्रदर्शन देशभक्ति का जज्बा भर देते हैं और आपकी आँखों में गर्मजोशी ,हिम्मत, गर्व, समा जाती हैं , जिसके लिए हमारे सीमा प्रहरी - बी एस एफ का धन्यवाद । इस परेड को देखना अनोखा रोमांचक है। वन्दे मातरम।

 


  अटारी बॉर्डर का वीडियो

वापस होटल तक लौटते हुए हमें आठ बज गए। हम फ्रेश होकर गोल्डन टेम्पल के लिए निकल गए, जो होटल से लगभग 10 मिनट की पैदल दूरी पर था। प्रवेश करते ही विशाल प्रांगण, आस्था का सैलाब और उसकी बहुत सुंदर संचालन व्यवस्था। अंदर बाईं तरफ जूते रखने का स्थान है, उसके बाद विशाल सरोवर है जिसमें स्त्री और पुरुषों के नहाने की अलग-अलग व्यवस्था है। पुरुष लोग खुले में भी नहा रहे थे। मैंने डुबकी लगाकर स्नान किया। उसके बाद अमृत पानी पिया और हम चल दिए लंगर में प्रसाद खाने के लिए, जहाँ हजारों लोगों को एक साथ खाना खिलाया जा रहा था। लंगर दिन-रात चलता रहता है। दाल, रोटी, सब्जी, खीर के साथ बहुत स्वादिष्ट प्रसाद। तत्पश्चात दर्शन, ध्यान और मनन, आस्था और श्रद्धा के सैलाब की व्यवस्थित परिक्रमा। इतनी भारी भीड़ के बावजूद एक अलग शांति का एहसास। यही निराकार शक्ति का वजूद है। दान राशि के लिए आप रसीद कटवा सकते हैं। अन्त में हमने घर के लिए प्रसाद लिया और होटल के लिए प्रस्थान किया। होटल की नज़दीकी यात्रा को सुगम बना रही थी।

 
                      गोल्डन टेम्पल , अमृतसर 
यात्रा बहुत ज्यादा भागमभाग वाली थी लेकिन तब भी बहुत रोचक थी और हमें लगा कि अमृतसर की गलियों को और खंगालना हो, छोले कुलचे की भिन्न-भिन्न किस्मों का स्वाद चखना हो, गोल्डन टेम्पल में और अच्छे से दर्शन करने हो, पार्टिशन म्यूजियम देखना हो, लोगों के दर्द के एहसास को छूना हो, तो हमें सर्दियों में फिर वापस आना होगा।

05.06.2026

हम हिंदुस्तानियों को एक समय बाहर रहने के बाद अपने घर की याद सताने लगती है, अतः सुबह जल्दी ही होटल पर गाड़ी को बुला लिया था और हम निकल गए वतन वापसी के लिए। रास्ते में हमारे साथी के यहाँ हमने लुधियाना में आलू के पराँठों और चाय का नाश्ता किया और दोपहर का खाना पैक करवा लिया क्योंकि बाहर का खाना खाते हुए बहुत दिन हो गए थे। पुराने दोस्तों से यूँ ही मिलते रहे, तो मन तरोताजा हो जाता है। यह लुधियाना का वो नया एरिया है, जहाँ आपको लुधियाना की भीड़-भाड़ और शोरगुल का पता ही नहीं चलेगा।

 
रास्ते में खाना खाते हुए और बीच में चाय पीते हुए हम लौटे और लगभग आठ बजे अपने घर वसुंधरा आ गए।

चलिए दोस्तों, आपको फिर ले चलूँगा बचपन, जवानी की कुछ  जानी-पहचानी, कुछ अनजानी, कुछ सुनसान गलियों में, मोहल्लों में, एक नए शहर, नए देहात, नए कस्बे, नए गाँव, नए पर्यटन स्थल के साथ।

तब तक के लिए अलविदा, अभिवादन।  

 


 

 




12 comments:

  1. बढ़िया वृतांत्र। खाने पाइन की मौज है अमृतसर में। साथ ही ऐतिहासिक शर भी है। अटारी बॉर्डर का शो अपने आप में अलग ही चीज़ है। शेयर करने का धन्यवाद। शुभ कामनाओं के साथ। - हर्ष वर्धन

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    1. धन्यवाद हर्ष भाई जी , वृतांत ने आपको वहाँ की यादें ताजा कराई है ऐसा लगा , साभार आपकी शुभकामनाओं के लिए - एस के लोहिया

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  2. लोहिया बहुत सुंदर चित्रण, आपने जलियांवाला बाग के र्दशन भी करा दिए, अमृतसरी कुल्छे भी खिला दिये। अच्छा चित्रण, आगे भी आप इसी प्रकार अपने अनुभव साझा करते रहे।

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    1. लोहिया जी

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    2. धन्यवाद त्यागी जी, वृतांत आपको सजीव लगा और आपने साथ में यात्रा की, अच्छा लगा । साभार - एस के लोहिया

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  3. यह यात्रा-वृत्तांत केवल अमृतसर से अटारी बॉर्डर तक की यात्रा का विवरण नहीं, बल्कि इतिहास, स्मृति, स्वाद, संवेदना और देशभक्ति को एक साथ समेटे हुए एक जीवंत दस्तावेज़ है। विशेष रूप से विभाजन की त्रासदी और अटारी की सीमा को देखकर लोहिया जी ने जिस तरह “सीमा” और “मनुष्य” के बीच का अंतर रेखांकित किया है, वह लेख को साधारण पर्यटन-वृत्तांत से ऊपर उठाता है।

    जलियाँवाला बाग, लक्कड़ मंडी, स्थानीय खान-पान, अटारी की परेड और स्वर्ण मंदिर—हर पड़ाव को लेखक ने अपनी आँखों से देखने के साथ-साथ अपनी अनुभूति से भी जोड़ा है। “परिंदे आज भी इस खेत से उस खेत बेखौफ जा रहे हैं…” जैसी पंक्तियाँ यात्रा के दृश्य को एक गहरी मानवीय और दार्शनिक अर्थवत्ता देती हैं। वहीं अमृतसर के छोले-कुलचे से लेकर लंगर की पंगत तक का वर्णन यात्रा को पाठक के लिए स्वाद और अनुभव, दोनों स्तरों पर जीवंत कर देता है।

    कुछ स्थानों पर यात्रा की घटनाएँ थोड़ी क्रम-वर्णनात्मक हो गई हैं, फिर भी इसकी सबसे बड़ी खूबी इसकी आत्मीयता और सहजता है—लोहिया जी पर्यटक बनकर नहीं, एक संवेदनशील मनुष्य बनकर यात्रा करते हैं और पाठक को अपने साथ लेकर चलते हैं।

    कुल मिलाकर यह यात्रा-वृत्तांत बताता है कि अच्छी यात्रा केवल जगहों को देखना नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे इतिहास, लोगों और भावनाओं को महसूस करना है। ऐसा लगा कि दो वर्ष पहले मेरी अमृतसर यात्रा का वृतचित्र फ्लैशबैक में चला दस गया हो। वास्तव में अमृतसर एक शहर नहीं, स्मृतियों, जख्मों, आस्था, स्वाद और जीवंतता का विराट अनुभव है।

    एक पठनीय, संवेदनशील और मन में देर तक ठहर जाने वाला यात्रा-वृत्तांत। लोहिया जी को हार्दिक बधाई और ऐसी ही यात्राओं की अगली कड़ी की प्रतीक्षा।

    — महेश वर्मा 🙏🏼
    maheshverma.hpr@gmail.com

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  4. धन्यवाद वर्मा साहब। आपने यात्रा को बारीकी से महसूस किया और जाना। पढ़ते पढ़ते आपकी अपनी पुरानी यात्रा आँखों के सामने आ गई यह हर्ष का विषय है । आपका हौसला बढ़ाने के लिए हार्दिक धन्यवाद। निःसन्देह यात्राओं का दौर चलता रहेगा । साभार - एस के लोहिया

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  5. यात्रा विवरण अति सुन्दर तरह से प्रस्तुत किया गया | लोहिया जी को हार्दिक बधाई

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  6. धन्यवाद सिंघल जी , आपको यात्रा वृतांत की प्रस्तुति सुंदर लगी जानकर अच्छा लगा , साभार ।

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  7. योगेंद्र आहूजाAugust 14, 2026 at 8:22 PM

    यह यात्रा-वृत्तांत भी बहुत अच्छा लगा। हर बार की तरह यह भी बहुत जीवंत है और पाठकों को आपके सफ़र में हमसफ़र होने का एहसास कराता है।

    अच्छी बात यह है कि आपने सिर्फ़ वहाँ के वर्तमान को नहीं देखा, उसके अतीत को भी छुआ है - एक ऐसा अतीत जो बहुत दर्दनाक है और गहरी तकलीफ़ से गुज़रा है। आज का अमृतसर भले ही ख़ुशहाली और रौनक़ से भरा दिखता हो, लेकिन उस पुराने दर्द की एक परछाईं अब भी उसके वर्तमान पर मौजूद है।

    इसके बावजूद वहाँ की ज़िंदगी, संस्कृति, ज़िंदादिल लोग और अपने दुखों को पीछे छोड़कर ज़िंदगी को पूरी शिद्दत से जीने का अंदाज़ - इन सबको आपने बहुत ख़ूबसूरती से व्यक्त किया है।

    बहुत अच्छा वृत्तांत है। बहुत-बहुत बधाई!

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  8. धन्यवाद आहूजा जी , आपको यात्रा वृतांत जीवंत लगा और साथ ही वातावरण में दुखों के पहाड़ को पार करने के बाद लोगों की जिंदादिली भी भायी , यह बड़ी अच्छी बात है। हौसला बढ़ाने के लिए धन्यवाद एवं आभार ताकि सिलसिला अनवरत चलता रहे । एस के लोहिया

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  9. Nice, mamaji, written easy language

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